बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद यादों की सुनहरी धूप निकली
मैंने अपना बदन सेंका,
ख़्याल महके जब ज़हन पे जमी बर्फ़ पिघली
मैंने तस्वीरे-आज फेंका…

मालती की बेलें औराक़ पे हर्फ़ों की दीवार से लिपटीं
ख़ुशबू-ए-मिज़ाज रखके यह मेरी आँखों में सिमटीं

रोज़ रात शबनम में भीग जाती हैं सारी ख़ाहिशें जब
उड़ चलती है फ़ाख़्ता-ए-मन पुराने शहर की तरफ़

लफ़्ज़ों की मौज ने ली अँगड़ाई रिश्तों के बदन पे
मानूस चेहरों के चराग़ जल उठे ताक-ए-ज़हन पे

इन दिनों उड़ता फिरा हूँ मैं आँधी की तरह आवारा
लूटने के लिए वो पुराने मौसम पतंगों वाले दोबारा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

Published by

Vinay Prajapati

Vinay Prajapati 'Nazar' is a Hindi-Urdu poet who belongs to city of tahzeeb Lucknow. By profession he is a fashion technocrat and alumni of India's premier fashion institute 'NIFT'.

6 thoughts on “बहुत दिनों बाद”

  1. मालती की बेलें औराक़ पे हर्फ़ों की दीवार से लिपटीं
    ख़ुशबू-ए-मिज़ाज रखके यह मेरी आँखों में सिमटी
    bhut khub.likhate rhe.

  2. bahut din baad aaj kayamat dehke
    rooh-e-kafan pe mere motiya mehke
    dil ke har taar tod ke nikal jaein gar
    phir bhala kaise is saaz pe sargam chalke?

    ek bewafa se wafaa-e-hina mangi thi
    kitne naadan the ham kyunkar yeh dua maangi thi
    beete janmon ka karz abhi bhaari hampar
    buniyaad-e-zindagi tere aagosh ki mangi thi

    raat bimar ke ik pal ki tarah kat jayegi
    zindagi dhali shaam ki janib guzar jayegi
    dard-e-jigar mein gham-e-tanhai shamil karke
    rang-e-tasveer aur tabassum nkhar jayegi

    *extempore for you

  3. Your geet motivated me so….

    And usually the first efforts are the most fruitful…like the first love !

    लफ़्ज़ों की मौज ने ली अँगड़ाई रिश्तों के बदन पे
    मानूस चेहरों के चराग़ जल उठे ताक-ए-ज़हन पे

    This is so so so beautiful…

  4. इन दिनों उड़ता फिरा हूँ मैं आँधी की तरह आवारा
    लूटने के लिए वो पुराने मौसम पतंगों वाले दोबारा
    “tareef ke kabil”
    Regards

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *