तेरे तीरे-नज़र का घायल हूँ मैं

तेरे तीरे-नज़र का घायल हूँ मैं
तेरे हुस्न के पीछे पागल हूँ मैं
शैदाई दीवाना आवारा बादल हूँ मैं
तेरे तीरे-नज़र का घायल हूँ मैं

तेरे ख़ाब पलकों में छिपाये फिरता हूँ
गिर न जायें आँसू बनके डरता हूँ
यह है इब्तदा-ए-सहर-ए-मोहब्बत
इन्तहाने-इम्तिहाँ के लिए मरता हूँ

ऊदी-ऊदी साँसों से सीने में जलन है
सूखा-सूखा मेरे दिल का गुलशन है
हैं दूर तक वदियों में पानी की तहें
फिर किसके लिए प्यासा मेरा मन है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

रातभर चाँद देखा किये

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये
रातभर चाँद देखा किये

कभी हाथ से ढका चाँद को
कभी बादलों से उठाया भी
गदेली पर रखकर उसे
कभी होंटों तक लाया भी

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…

सितारे टूटते बुझते रहे
उनसे तुम्हें माँगते रहे
ख़ाली था ख़ामोश था लम्हा
हम तेरा नाम लिखते रहे

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…

रूह बर्फ़ में जलने लगी
साँस-साँस पिघलने लगी
तेरी तस्वीर देखकर
तन्हाई मसलने लगी

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…

सन्नाटों में बहता रहा
ख़ामोशी से कहता रहा
तुम कहाँ अब कैसी हो
मैं कोहरे सहता रहा

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यह मौसम भी तुम हो

यह मौसम भी तुम हो,
यह सावन भी तुम हो,
तुम हो… मेरे लिए…
मेरे सनम भी तुम हो

तुम नहीं होते’ तो तुम्हारा एहसास होता है
कोई जगता है रातों में, ख़ाबों के बीज बोता है

यह बिजली भी तुम हो,
यह बदली भी तुम हो,
तुम बूँदों में बरसती हो…
यह रिमझम भी तुम हो

गीले मन को बहुत सुखाया, मगर सूखा नहीं
मन है उदास तेरे लिए, मगर रूखा नहीं

यह अगन भी तुम हो,
यह लगन भी तुम हो,
तुम हो मन-दरपन…
मेरा दरपन भी तुम हो

कितनी बार देखा है, साहिलों पर खड़े हुए
तुम आ रही हो, मुझको ढूँढ़ते-पुकारते हुए

यह जीवन भी तुम हो,
यह धड़कन भी तुम हो,
तुमसे है मेरा यौवन…
मेरा यौवन भी तुम हो

इश्क़ ने ढूँढ़ा तुझे, प्यार ने छूना चाहा तुझे
मैं तेरा प्यार हूँ, आवारा न समझ मुझे

यह मौसम भी तुम हो,
यह सावन भी तुम हो,
तुम हो… मेरे लिए…
मेरे सनम भी तुम हो


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

चोरी-चोरी तुम मुझको देखती

कभी कहीं हम-तुम मिलते, जब मिलते
लड़ते-झगड़ते, बिगड़ते-बड़बड़ाते
रूठते-मनाते और फिर चिढ़ते-चिढ़ाते
कभी कहीं हम-तुम, कभी कहीं हम-तुम

नहीं तुम, नहीं तुम! तुम्हें कुछ नहीं आता
इस बात पर तुम लड़ती, मैं झगड़ता
काश! ऐसा भी तेरे-मेरे साथ हो जाता
कभी कहीं कभी कहीं, कभी कहीं हम-तुम

पीछे-पीछे मैं तुम्हारे आता, तुम पलटती
मैं तुमको फूल देता और मुस्कुराता
तुम रूठती, मुँह बनाती, मैं मनाता
कभी कहीं कभी कहीं, कभी कहीं हम-तुम

छोटी-छोटी बातों पर बार-बार चिढ़ जाती
चिढ़कर मुझको चिढ़ाती, मुँह फुलाती
आँखें दिखाती, रूठी हो मुझको जताती
कभी कहीं कभी कहीं, कभी कहीं हम-तुम

कभी-कभी चोरी-चोरी तुम मुझको देखती
मैं कहता ‘क्या है’, तुम कहती ‘कुछ नहीं’
हम आँखों में एक-दूसरे का दिल पढ़ते
कभी कहीं कभी कहीं, कभी कहीं हम-तुम


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

गोरी, आज यह सिंगार किसके लिए है

गोरी, आज यह सिंगार किसके लिए है
गुलाबी अंगों में निखार किसके लिए है
क्या सजन जी से मिलने का कोई वादा है
कहो ना हमसे आज क्या इरादा है…!

लटों की’ यह शरारत किसके लिए है
दिन-रात इतनी चाहत किसके लिए है
आज रात बलम जी को दीवाना कर दोगी
तीरे-नज़र का निशाना कर दोगी…

पूनम है आज की शब’ तेरे रंग से
खिल-खिल जाओगी पिया जी के संग से
मीठी-मीठी आज उनसे बतियाँ बनाओगी
उलझी-उलझी बाँहों में’ रतियाँ बिताओगी

गोरी का आज यह सिंगार पिया के लिए है
गुलाबी अंगों में निखार पिया के लिए है
हाँ-हाँ सजन जी से मिलने का कोई वादा है
कहो ना हमसे आज क्या इरादा है…!

जाओ-जाओ री सखियों ना सताओ मुझको
लाज आये री मुझे कुछ ना बताऊँ तुमको
पिया जी से किया इक वादा निभाना है
जाओ री सखियों, क्या कुछ और बताना है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४