सारा-सारा दिन मैं तुम्हें याद करता हूँ

सारा-सारा दिन मैं तुम्हें याद करता हूँ
यह सच है मैं तुमसे प्यार करता हूँ
तुम सदा रहो मेरे साथ इन राहों पर
यह दुआ करता हूँ…

बादलों में, बारिशों में
बसों में, ट्रेनों में
सभी जगह मैं तुम्हें खोजता हूँ
सभी जगह मैं तुम्हें खोजता हूँ
मैं तुम्हें याद करता हूँ
मैं तुम्हें चाहता हूँ
यह सच है मैं तुम्हें याद करता हूँ
इन राहों पर…

मैं क्या ख़ुद के लिए कर सकता हूँ
तुम लौट आओ और मुझको सँभालो
कहो, तुम इतनी दूर क्यों गयी हो?
लौट आओ, यह दुआ करता हूँ…

शीत का मौसम जा चुका है
यह सच है मैं तुमसे प्यार करता हूँ
तुम सदा रहो मेरे साथ इन राहों में
यह दुआ करता हूँ…

कोई मुझको नहीं समझता
पागलों की तरह तुम्हें हूँ चाहता
मैं प्यार की गहराइयों में हूँ
पश्चिम की हवाओं का झोंका
मुझे बेबस कर देता है
तुम लौट आओ और मुझको सँभालो
इन राहों पर…

सारा-सारा दिन मैं तुम्हें याद करता हूँ
यह सच है मैं तुमसे प्यार करता हूँ
तुम सदा रहो मेरे साथ इन राहों पर
यह दुआ करता हूँ…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००१-२००२

मेरी आँखों में तुम बसे हो

मेरी आँखों में तुम बसे हो
तुम्हारे बिना मैं अकेला रहता हूँ
तुम कब आ रहे हो
मुझको बताओ, तुम कब आ रहे हो
मैं तुम्हारे इंतज़ार में हूँ…(२)

रोज़ सुबह जब सूरज चमकता है
मैं अपनी लकीरें पढ़ता हूँ
यह सच है कि आसमान नीला है
और यहाँ पर कोई भी बादल नहीं
पर मैं तुम्हारा नाम पुकरता हूँ…

सोफ़िया सोफ़िया सोफ़िया…

रोज़ सूरज की किरणों में
जीवन के अजीब रास्तों में
मेरे दिल की गहराइयों में
मेरे दर्द की पुकार में
मैं तुम्हारी ज़रूरत महसूस करता हूँ
यह तुम ही हो, जिससे प्यार करता हूँ…

सोफ़िया सोफ़िया सोफ़िया…

मेरी आँखों में तुम बसे हो
तुम्हारे बिना मैं अकेला रहता हूँ
तुम कब आ रहे हो
मुझको बताओ, तुम कब आ रहे हो
मैं तुम्हारे इंतज़ार में हूँ…(२)

इस प्यार ने मुझको बहुत दर्द दिया है
पर मैंने इसे बार-बार पाना चाहा है
मैं जानता हूँ कितने ही आशिक़ मिट गये
पर मैंने सदा इनसे ऊँचा उठना चाहा है

इस प्यार के खेल में, ओ मेरी सोफ़िया
इस प्यार के खेल में…
मैं जब भी तुम्हारा नाम पुकराता हूँ
दिल बेइन्तहाँ दर्द महसूस करता हूँ…

सोफ़िया सोफ़िया सोफ़िया…

मेरी आँखों में तुम बसे हो
तुम्हारे बिना मैं अकेला रहता हूँ
तुम कब आ रहे हो
मुझको बताओ, तुम कब आ रहे हो
मैं तुम्हारे इंतज़ार में हूँ…(२)


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००१-२००२

मैं तो दीवाना हूँ

मैं’ मैं तो दीवाना हूँ
करता हूँ कुछ काम ऐसे
न करूँ तो पहचानेंगे लोग कैसे

तेरे बिन जिया जाये ना
अब इक पल तेरे बिना रहा जाये ना

ये’ ये तो लोग हैं
झूठा कहेंगे मुझको
दिल’ दिल से अपने पूछ ज़रा
क्या यह मानेगा?
जो यह कहेंगे मुझको

मैं’ मैं तो दीवाना हूँ
करता हूँ कुछ काम ऐसे
न करूँ तो पहचानेंगे लोग कैसे

तेरे बिन जिया जाये ना
अब इक पल तेरे बिना रहा जाये ना

तेरी आँखें ये जो कुछ कहती हैं
जब प्यार से ज़रा कुछ झुकती है
ये झुकी आँखों की है हया
कि मुझको पता चल गया…
कितना प्यार तू मुझसे करती है
हाँ-जान देती है, मुझसे मरती है…

मैं’ मैं तो दीवाना हूँ
लुट भी जाऊँ तो लूँगा नाम तेरा

मैं’ मैं तो दीवाना हूँ
करता हूँ कुछ काम ऐसे
न करूँ तो पहचानेंगे लोग कैसे

तेरे बिन जिया जाये ना
अब इक पल तेरे बिना रहा जाये ना

हाँ ये प्यार है
मुझको इक़रार है
आ बाँहों में झूम ले
हाथों में हाथ ले…

मैं’ मैं तो दीवाना हूँ
करता हूँ कुछ काम ऐसे
न करूँ तो पहचानेंगे लोग कैसे

तेरे बिन जिया जाये ना
अब इक पल तेरे बिना रहा जाये ना

मेरा क्या नाम है? दीवानों का काम है
अब जो चाहे तू मुझको कहे
तू जो कहे तो चाँद पे तुझको ले चलूँ
मैं’ मैं तो दीवाना हूँ

मैं’ मैं तो दीवाना हूँ
करता हूँ कुछ काम ऐसे
न करूँ तो पहचानेंगे लोग कैसे

तेरे बिन जिया जाये ना
अब इक पल तेरे बिना रहा जाये ना

जाने-अन्जाने हो गया
मुझको तो प्यार हो गया
जादू-सा चल गया
बेक़ाबू दिल गया
तूने ले लिया…
मुझपे एहसान कर दिया

मैं’ मैं तो दीवाना हूँ
लुट भी जाऊँ तो लूँगा नाम तेरा

मैं’ मैं तो दीवाना हूँ
करता हूँ कुछ काम ऐसे
न करूँ तो पहचानेंगे लोग कैसे

तेरे बिन जिया जाये ना
अब इक पल तेरे बिना रहा जाये ना


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००१-२००२

सूखे गुलाब की पंखुड़ियों की तरह

सूखे गुलाब की पंखुड़ियों की तरह
मेरी यादों की किताब में तुम जी रही हो
तुम जी रही हो…
जाने कैसे मुझसे बिछड़ के तन्हा जी रही हो

मैं अपने तन्हा टूटे दिल में
तुमको रोज़ बहुत बहुत क़रीब महसूस करता हूँ
ऐसा पहले कभी न महसूस हुआ
जैसा कि मैं अब महसूस करता हूँ
यह मोहब्बत का एहसास है
केवल तुम्हारे लिए…

क्या तुम इसको महसूस करती थी
क्या तुम इसको महसूस कर सकती हो
कुछ तो कहो मेरे लिए मेरी मोहब्बत
क्यों तुम इतनी दूर रहती हो…

इस बंधन को जोड़ दो तुम
इन रस्मों को तोड़ दो तुम
मेरी मुहब्बत, मेरी मेहबूबा…

यह मोहब्बत क्या होती है?
आज से पहले मैं इससे अंजान था
तेरा चेहरा जैसे खिलती हुई नई सुबह
इसलिए मैं तुमको महसूस करता हूँ
जब सुबह-सुबह पुरवाई बहती है…

जब भी कभी तुम आओगे
इन गलियों में मुझको पाओगे
अब ये तुम पर है
कितना मुझे तुम तड़पाओगे

सूखे गुलाब की पंखुड़ियों की तरह
मेरी यादों की किताब में तुम जी रही हो
तुम जी रही हो…
जाने कैसे मुझसे बिछड़ के तन्हा जी रही हो

मौसमी पेड़ों की शाख़ों पर
गुलाबी गुल खिलाता है मौसम
बस तेरी यादों में
अपनी रातें बिताते हैं हम
तेरा चेहरा है आँखों में बसा
तूने ही इस बेरंग में रंग भरा

तुम आवाज़ दो तो सही
मैं तुम्हारी इक आवाज़ पे दौड़ा चला आऊँगा
कुछ तो कहो मेरे लिए मेरी मोहब्बत
क्यों तुम इतनी दूर रहती हो

इस बंधन को जोड़ दो तुम
इन रस्मों को तोड़ दो तुम
मेरी मुहब्बत, मेरी मेहबूबा…

सूखे गुलाब की पंखुड़ियों की तरह
मेरी यादों की किताब में तुम जी रही हो
तुम जी रही हो…
जाने कैसे मुझसे बिछड़ के तन्हा जी रही हो


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००१-२००२