हर मिज़ा पर तेरे लख़्ते-दिल है इस रंजूर का

हर मिज़ा१ पर तेरे लख़्ते-दिल२ है इस रंजूर३ का
ख़ून है सो दार४ पर साबित मिरे मंसूर का

पोंछ्ते ही पोंछ्ते गुज़रे है मुझको रोज़ो-शब
चश्म५ है या रब मिरी या मुँह किसी नासूर का

आफ़ताबे-सुब्हे-मशहर६ दाग़ पर दिल की मिरे
हुक्म रखता है तबीबों७, मरहमे-काफ़ूर का

क्या करूँगा लेके वाइज़ हाथ में हूरों से जाम
हूँ मैं साग़रकश८ किसी की नरगिसे-मख़्मूर का९

इस क़दर बिंतुल-अनब१० से दिल है ‘सौदा’ का बुरा
ज़ख़्म ने दिल के न देखा मुँह कभू११ अंगूर का

१.भौं २.दिल का टुकड़ा ३.दुखी प्राणी ४.फाँसी का तख़्ता ५.आँख
६.क़यामत की सुबह का सूरज ७.चिकित्सकों ८.मद्यप ९.किसी की
मस्त आँखों का(नरगिस का फूल कविता जगत में आँख के तुल्य
माना जाता है) १०.अंगूर की बेटी(शराब को सम्बोधित करते हैं)
११.कभी(पुरानी उर्दू में ऐसे ही लिखा जाता है)

2 Replies to “हर मिज़ा पर तेरे लख़्ते-दिल है इस रंजूर का”

  1. मियाँ यह मिर्ज़ा रफ़ी ‘सौदा’ की ग़ज़ल है जो कि मीर के समकलीन थे… और मेरे मुताबिक़ उनसे बेहतर भी… उनकी कई ग़ज़लें खो गई हैं और जो बची हैं उनका हिन्दी में संस्करण उपलब्द्ध नहीं है…

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