मैंने अक्सर खोया है उसे

मैंने अक्सर खोया है उसे
जो मेरे दिल के क़रीब आ जाता है
जब किसी की चाह में भटकता हूँ
यह दिल बहुत समझाता है

शायद इसी एक वजह से
किसी की हसरत से जी डरता है
बेपनाह प्यार करता है जिससे
तिल-तिलकर उसके लिए मरता है

कई बार मातम में ख़ुद को
सफ़ेद पोशाक पहने हुए देखा है मैंने
इसीलिए इक दीवार उठा रखी है
निगाहो-निगाहे-पनाह के बीच मैंने

हर शाम ज़हन के दरवाज़े पर
इक माज़ी की दस्तक होती है
तेरा पुराना पता पूछती ज़िन्दगी
मुझसे रोज़ ही रूब-रू होती है

वह यह बारहा कहती है मुझसे
मुझे इश्क़ है तुझसे, तुझी से
और मैं आँख चुराके कहता हूँ
मुझे इश्क़ नहीं तुझसे, किसी से

क्यों चली आयी है इस राह
ख़ुशबू के आवारा बादल की तरह
कि नाचीज़ का दिल काला है
तेरी आँखों के काजल की तरह


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

10 Replies to “मैंने अक्सर खोया है उसे”

  1. क्यों चली आयी है इस राह
    ख़ुशबू के आवारा बादल की तरह
    कि नाचीज़ का दिल काला है
    तेरी आँखों के काजल की तरह

    You have a terrific capacity for creating metaphors……

  2. Madhu Ji, It’s God’s gift to me and now I want to be professional in this field. I want to do some films but don’t know how to get a break in films. Do you have any idea?

    thanks.

  3. I wouldn’t know how to go about it in India. Probably have to find a mentor…

    If you were here I’d advise you to enrol in a poetry class/course at a University.The University would help you refine your work,create a portfolio for presentation, provides networking contacts, helps with publication, and generally guides you in the direction of such endeavors…

    There ae also poetry groups here who meet once a week, or once a month, hosted and facilitated by older, more established poets who are there to mentor the younger ones.

  4. काले दिल की तुलना आँख के काज़ल से करना बहुत सुंदर लगा

  5. @ ब्रिज, जी आप पढ़ते रहें और मैं लिखता रहूँ, यह दोस्ती यूँ भी निभे तो मज़ा है।

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