तुम मेरे हो

तुम मेरे हो, मेरे ही मेरे हो
कितनी हों दूरियाँ, कितने हों फ़ासले
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

दोनों हाथों की लकीरों में लिख लूँ
मैं तुम्हें इस जहाँ से छीन लूँ
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

पागल, शैदाई, क़ातिल हूँ तेरे लिए
हाँ मेरी जान तुम्हें पाने के लिए
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

मुश्किलों को आसाँ करना आता है
मुझे हद से गुज़रना आता है
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

जो तुम्हें देखे उसका अंजाम हूँ
मैं और मैं ही तेरा मक़ाम हूँ
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

लहू के क़तरे-क़तरे में तुम हो
दिल में धड़कनों में तुम हो
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

जान हो, ज़िन्दगी हो, तुम मेरी
ख़ुदा से बन्दगी हो, तुम मेरी
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

आओ तुमको अपना बना लूँ मैं
दिल, जान, सीने से लगा लूँ मैं
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

तू संग न होगा

तू कर यह वादा भी मेरे अल्लाह तू संग न होगा
तू है भी अगर किसी बुते-संग में तू संग न होगा

तेरी मर्ज़ी से यह गुलशन वीरानो-गुल्ज़ार हैं
मैं दुआ करूँगा दमे-आख़िर तक तू संग न होगा

मेरी क़िस्मत में क्या बदा है एक तू ही जानता है
गर हुआ कभी मेरी दुआ का हश्र तू संग न होगा

जुज़ मेरे हर मुक़ाम पर इक मुक़ीम दिखता  है
मैं तन्हा खड़ा हूँ कब से राह में तू संग न होगा

मत कर फ़िक्र मेरे ‘वफ़ा’ यह तेरा अंजाम नहीं
दिल दुखते-दुखते भी कहता रहा तू संग न होगा

इस ग़ज़ल में संग एक उर्दू अल्फ़ाज़ है जिसका अर्थ पत्थर होता है|


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००३

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही
वह जो है माहे-कामिल है वही

मुझको तो इख़लास है उसी से
ख़ुदा मुझसे संगदिल ही सही

अजनबी है जी मेरा मुझसे ही
वह दर्द से ग़ाफ़िल ही सही

चश्मे-तर से न बुझी आतिश
यह दाग़े-तहे-दिल ही सही

मरहम न करो घाव पर मेरे
चाहत मेरी नाक़ाबिल ही सही

अंजाम की परवाह है किसको
सीने में शीशाए-दिल ही सही

उफ़ तक न की जाये तेरे ग़म में
नालए-सोज़े-दिल है यही

बोले है तेरा इश्क़ सर चढ़के
ख़ुद में मुकम्मिल है यही

चाँदनी रिदा है रोशनाई आज
शाम को सुबह के साहिल ही सही

अफ़सोस किस बात का नज़र
तमाम उम्र का हासिल है यही


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३