जब भी धड़कता है दिल

जब भी धड़कता है दिल, खटकता है तेरी कमी का एहसास
साँस इसलिए लेता हूँ मैं, कि रह सकूँ तेरी यादों में उदास

क्या करूँ इस बीमारि-ए-दिल का, छुटती नहीं मेरे दिल से
कौन करे मेरी चारागरी कौन जाने किसको है दोस्ती का पास*

मुझको तन्हा रहना अच्छा लगता है तेरी तस्वीरों के साथ
जाने कब छुटे यह शौक़ मेरा, कब छुटे ज़िन्दगी की फाँस

मौत का धोखा है इक मुझ अकेले से ही, सबको तो मिल जाती है
जाने कब बुझेगी, मेरी नब्ज़ों में भटकती हुई, यह साँस

* दोस्ती के ढंग


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

जो दिल से जाता नहीं है

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है

साँसों की सरगम बस तुम ही तुम
लफ़्ज़ों में जब हम बस तुम ही तुम

कहना कितना मुश्किल था
यह समझा न सके
अपने दिल की बात हम
तुम्हें बता न सके

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है

प्यार क्या है सनम हमें कब पता था
हमें जब तुम मिले तब पता चला था

अकेले रहना मुमकिन नहीं
यह कह न सके
अपने दिल के जज़्बात हम
तुम्हें जता न सके

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है

अब तो ऐसा लगता है मुझको
जैसे फूलों में ख़ुशबू नहीं है
तुम जो नहीं यहाँ पर सनम
जैसे यहाँ पर कुछ भी नहीं है

बेचैन करती हैं यादें दिन-रात
बुझती नहीं हैं साँसें
हर लम्हा सोचता हूँ क्या मैं
करूँ तो क्या करूँ

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है

कुछ और अब बाक़ी नहीं
बस मैं हूँ मेरा ख़ाब है
ख़ामोश रहती हैं यह रातें
बस मैं हूँ मेरा साथ है

ज़िन्दगी मेरी तुम बदलकर चले गये
तन्हा कर गये हमें तन्हा कर गये

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

हज़ारों की भीड़ में हम अकेले

हज़ारों की भीड़ में हम अकेले रह गये
जिसके साथ की तमन्ना थी मेरे दिल को
वह तो केवल अब मेरे ख़ाबों में रह गये
वह तो केवल अब मेरे ख़ाबों में रह गये

कि अब हम कहाँ कि अब तुम कहाँ
यह दीवारें कैसी बन गयीं दोनों के दर्मियाँ
तेरी इक नज़र पर यह दिल आहें भरता
मगर यह टूटकर बिखरा है जाने कहाँ-कहाँ

इंतिज़ार तब तक रहेगा तब तक है ज़िन्दगी
उम्मीद है अंधेरों में भी मिलेगी हमें रोशनी

आँखों का ग़म पलकों के किनारे टपकता है
ढ़ूँढ़ता है नज़ारा जिसमें सजा हो वह समाँ
राहों की मिट्टी पर क़दमों के निशाँ बाक़ी हैं
उनको ही बैठकर पढ़ता हूँ सुबह-शाम यहाँ

कि अब हम कहाँ कि अब तुम कहाँ
यह दीवारें कैसी बन गयीं दोनों के दर्मियाँ

कल और था, आज और है, बदल गया जहाँ
एक बदला नहीं मैं और मेरा प्यार, हमनवाँ
भूलना इतना आसाँ होता तो भूल चुके होते
तेरे घर के दरवाज़े को देखना हम छोड़ देते

कि अब हम कहाँ कि अब तुम कहाँ
यह दीवारें कैसी बन गयीं दोनों के दर्मियाँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

तू एक बार देख ले पीछे मुड़के

तू एक बार देख ले पीछे मुड़के
हम हैं वहीं जहाँ थे कभी अकेले
ऐसा यह क्या हो गया अन्जाने
दिल मेरा क्यों टूट गया रब जाने

तुम गये तन्हा हो गयी ज़िन्दगी
तुम गये दिल से गयी हर ख़ुशी
हर लम्हा तू मुझे याद आ रही है
याद आ के मुझे तड़पा रही है

तू एक बार देख ले पीछे मुड़के
हम हैं वहीं जहाँ थे कभी अकेले

यारा, तेरे चाहने वाले हम हैं
मेरे दामन में कितने ग़म हैं
कैसे रहते हैं हम यहाँ ज़िन्दा
जैसे साहिल पे मिट्टी का घरौंदा

तू एक बार देख ले पीछे मुड़के
हम हैं वहीं जहाँ थे कभी अकेले
तू आ कभी देख ले मेरी बेख़ुदी
तू आ कभी लौटा दे मेरी ज़िन्दगी

यारा तू ज़िन्दगी, तू है ज़िन्दगी…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

यह कोरे काग़ज़

यह कोरे काग़ज़ करते हैं दिल की बात
जैसे यह कोरे हैं वैसे मेरे दिन-रात
अपनी मुलाक़ात कब मुकम्मल हुई थी
दर्द मेरे दिल में बढ़ते रहे इफ़रात…

इन अफ़सानों में अपना एक किरदार है
ज़ुबाँ से निकला हर लफ़्ज़ किरायेदार है
गुज़रती तारीख़ों में तेरी राह तकते हैं
यह फ़ैसला कैसे हो किस पे एतबार है

यह कोरे काग़ज़ करते हैं दिल की बात
जैसे यह कोरे हैं वैसे मेरे दिन-रात…

बैठते हैं जब अकेले यूँ तन्हाई में हम
एक ख़त लिखने की सोचते हैं तुम्हें हम
तभी एक आहट-सी कानों में जाती है
और फिर खिड़की से देखते हैं तुम्हें हम

अपनी मुलाक़ात कब मुकम्मल हुई  थी
दर्द मेरे दिल में बढ़ते रहे इफ़रात…

संवाद:
हर कोरा काग़ज़ यूँ फड़फड़ाता है
जैसे आवाज़ देकर हमें बुलाता है
एक तकलीफ़ दिल में उठती है
जब आपका ख़्याल हमें आता है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९