आइने में जब देखा, ख़ुद को पाया है कमशक्ल

यह ना जानूँ मैं जानाँ के क़ाबिल हूँ या नहीं
इक अरसे से दौरे-मोहब्बत में गिरफ़्तार हूँ मैं
बाइसे-सोज़े-दिल जो खुला, तुम्हारा तस्व्वुर था
नहीं जानता कि हूँ क्या मगर तेरा प्यार हूँ मैं

दौलते-जहाँ से क्या मिलेगा बिना तेरे मुझको
देख समन्दरे-दर्द को ख़ुद दर्द बेशुमार हूँ मैं
न सहर देखी कोई’ न कोई शाम देखी है मैंने
तेरे बाद सोज़े-दिल से बहुत बेइख़्तियार हूँ मैं

ख़ालिक से हर दुआ में मैंने माँगा है तुझको
मुझे तेरी चाह है तेरे प्यार का तलबगार हूँ मैं
जीता हूँ इस आस पे इक रोज़ मिलूँगा तुमसे
अपने मर्ज़े-दिल का ख़ुद ही ग़म-गुसार हूँ मैं

आइने में जब देखा, ख़ुद को पाया है कमशक्ल
क्या करूँ जैसा भी हूँ तुझपे जाँ-निसार हूँ मैं
ज़रूर बयाँ करूँगा अपना अरसे-मुहब्बत तुझसे
ना करूँ अगर तो भी कहाँ मानिन्दे-बहार हूँ मै


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

ख़ुशबू के आइने ने

ख़ुशबू के आइने ने
मेरे चेहरे पर धूप बिछा दी
जो बात भूल गया था
एक बार फिर याद करा दी

वक़्त ने आवाज़ दी
ऐ ज़िन्दगी आज फिर हैराँ हूँ
कल तक मैं क्या था
सोचो तो आज मैं कहाँ हूँ

सूखे हुए लफ़्ज़ हैं
अब नज़्म की बात क्या होगी
बहार के पुरज़ों ने
अब ज़र्द ख़िज़ाँ को विदा दी

तेरा रेशमी उजला
आइने-सा रुख़ न भूल पाऊँगा
मैं गुज़र रहा हूँ
पर बीती गली न लौट पाऊँगा

अब्र गुज़रे सहरा से
वक़्त की रेत उसने भिगा दी
शज़र की प्यास बुझे
किसने उसको मिराज़ दिखा दी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

अजब-सी टीस लगी है

अजब-सी टीस लगी है
दस दूनी बीस लगी है,
आँखों में आँच भरी है
उन्नीस की बीस लगी है

दिल में दर्द उगते हैं
साँसें ठण्डी-ठण्डी हैं,
मेरा हर ख़ाब टूटा है
ख़ाहिश भीख लगी है

डालों से फूल गिर गये
ख़ुशबू के मौसम गये,
आइनों ने धोखा दिया
ज़िन्दा तस्वीर लगी है

रोशनी का दरिया बहे
मुझे कोई अपना कहे,
वह ख़लिश बुझाये तो
ज़िंदगी मरीज़ लगी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

मैं क्यों आज तक उसकी ख़ाहिश करता हूँ

मैं क्यों आज तक उसकी ख़ाहिश करता हूँ
जो मुझको भीड़ में अकेला छोड़कर गया है
सुबह आज भी उसको आइनों में जोड़ता हूँ
जो मेरे दिल को खिलौने-सा तोड़कर गया है…

बे-तस्कीनियाँ उजले चेहरों से बढ़ती हैं
हर पल मुझको अक्स की तरह पढ़ती हैं
अंधेरी रात है मैं छत पर तन्हा बैठा हूँ
एक-एक पल दोपहर-सा गुज़र रहा है…

कोई उठाये मुझको या फिर बैठा रहने दे
ख़ाबों के जंगल जलाये ना, धुँआ उड़ाये ना
ख़ाहिशों का अम्बार है, दिल ज़ार-ज़ार है
आँखों की नदिया सुखाये ना, चाँद जलाये ना

अजीब धुनकी में है दिल और कुछ नहीं है
दर्द का ग़ुबार है दिल और कुछ नहीं है
मुस्कुराहट जब खिली गुलाबी लबों पर
एक हसीन ख़ाब सारी रात जागता रहा है…

एक नयी परवाज़ दिखायी दी है आसमाँ में
कुछ नये अन्दाज़ भी हैं उसकी ज़बाँ में
बाँट नहीं सकता किसी से लम्हों के टुकड़े
ख़ुदाया मेरा कोई नहीं इतने बड़े जहाँ में


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

कहीं भी पूरा नहीं था,
मेरे जिस्म पे इश्क़ का चीरा नहीं था
ख़ाली-ख़ाली था सूना-सूना था
दिल मेरा, यह दिल मेरा…

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

क़तरा-क़तरा हर एक क़तरा
ज़हन से कोई न उतरा,
मीठे-मीठे ज़हर के प्याले
मैं भी एक उम्र से गुज़रा…

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

मैंने पहल नहीं की थी
मैं इस सब से परहेज़ रखता हूँ
कितने मीठे होते हैं अय्यार
मैं यह कब चखता हूँ…

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

ऐसे अर्श पे कब था डेरा
उगता है जहाँ, चटखा सवेरा
तकलीफ़ तख़लीक़ होती रही
दिल में नहीं होता बसेरा…

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

अय्यार= चालाक, clever; अर्श= आसमाँ, sky; तख़लीक़= उद्भव, creation


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४