कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले

कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले
कभी तेरे आगोश में पनाह मिले
मैं शज़रे-धूप की छाँव में बैठा हूँ
कभी तो इनायते-निगाह मिले

तुम हाथ तो बढ़ा दो मेरे मसीहा
ज़ख़्मों पे रख दो मरहम का फीहा
बेबसी में मेरा दम घुटने लगा है
फिर से सौंधी हुई सुबह मिले

रुख़े-ख़ुशी मेरी तरफ़ मोड़ दो
मेरे दर्द का हर तागा तोड़ दो
एक ही ख़ाहिश है मेरी बरसों से
तेरे दिल में मुझे जगह मिले

मैं अपनी कोशिशों में रहूँ क़ाबिल
इस दरिया को मिले तेरा साहिल
तुम्हीं से ज़िन्दगी को मानी मिला है
काश कि तेरी-मेरी हर राह मिले

मुश्किलें सब यह आसाँ हो जायें
जो हम दो जिस्म एक जाँ हो जायें
लम्हों में सदियाँ तय कर चुका हूँ
तेरा-मेरा दिल किसी तरह मिले


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

दिल में तेरे लिए सच्ची अक़ीदत है

है जो किसी से तुम्हें तो गुल से निस्बत है
तुम मुझको मिले हो यह मेरी क़िस्मत है

तेरे तब्बसुम से ही है यह रंगे-बहार
लगता है अब जैसे सारी फ़िज़ा जन्नत है

तेरी आँखों की गुलाबी डोरियाँ जैसे नश्शा-ए-मै
तिश्ना-लब हूँ मुझे पीने की हसरत है

तेरी ज़ुल्फ़ों से गुज़रते देखी है मैंने सबा
हाए! यह सबा भी कितनी खु़श-क़िस्मत है

तेरे अबरू मानिन्दे-कमान उठते हैं
मुझको तेरे आगोश में मरने की चाहत है

तेरे लब हैं की पंखुड़ियाँ गुलाब की हैं
इक बोसा पाने को शबो-रोज़ की मिन्नत है

सुना है जन्नत की हूरों के बारे में बहुत
मगर उनमें कहाँ यह कशिशे-क़ामत है

देखा है तुमने कभी चाँद को सरे-शाम
एक वही है जो तेरी तरह खू़बसूरत है

हो तुम ही मानिन्दे-खु़दा मेरे लिए
इस दिल में तेरे लिए सच्ची अक़ीदत है

तुम क़रीब होते हो दर्द मिट जाते हैं
तुमसे ही मुझको होती नसीब फ़रहत है

तुम्हें देखा तो मैंने अपनी ज़िन्दगी देखी
तुमको चाहना ही खु़दा की इबादत है

मेरा दिल जितना चाहता है तुमको सनम
तुम्हें भी मुझसे उतनी ही मोहब्बत है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २६/०७/२००४

दोस्त, माफ़ कर देना मुझे

तुमने पुकारा था जब
मैंने सुना तो था
मगर मेरा ग़ुरूर
मेरे ज़हन पे यूँ चढ़के बैठा था
कि मैंने देखा भी न तेरे जानिब

जाने किस मशक्कत में
रहा होगा तेरा दिमाग़
जाने तुमने क्या-क्या न सोचा होगा
दुबारा जब तुमने
निगाह चुराके देखा था
उस वक़्त भी तो मैं
ग़ुरूर को आगोश में लिए गुज़रा था

वक़्त की नब्ज़ तो
बहुत भारी लग रही थी
उस पहर मुझे…
जाने किस ख़्याल को
बाँहों में भरकर
तुम घर जा रहे थे

पहुँचा तो था मैं
मगर देर से पहुँचा था
वो दिन का चाँद
मेरी हथेली से फिसल चुका था,
जा चुका था…

“कल फिर मिलना होगा
कल फिर नये बहाने होंगे
कोई इशारा बयाँ होगा
लफ़्ज़ तुम्हें नये बनाने होंगे”

दोस्त, माफ़ कर देना मुझे
जो ज़रा भी ग़ुबार हो मन में…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

उल्टे सूरज की आग जम गयी

सोचा था दिन चढ़ेगा दोपहर तक
तो सूरज की आग
सर्दियों के सर्द बादलों को ग़ुबार कर देगी
बहने लगेगा बदन में जमा हुआ लहू
और झपकने लगेंगी एक टुक अपलक पलकें
लेकिन ऐसा कुछ भी हुआ नहीं

दिन दोपहर तो चढ़ा पर बादल नहीं छटे
कोहरा नहीं पिघला
उल्टे सूरज की आग जम गयी,
ठिठुर गयी…
सर्द हवा ने बुझा दिया दिन का सूरज
उतरने लगा शाम के आगोश में दिन

आज शफ़क़ न गुलाबी न जाफ़रानी थी
बस नीला स्लेटी आकाश
अजीब उदासियों के साथ बैठा रहा
न जाने किसके इन्तिज़ार में…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४