तुम गर हो सीना मुझको बना लो धड़कन

तुम गर हो सीना मुझ को बना लो धड़कन
आतिश बहे नस-नस में मिटे शीत की कम्पन

जिस सूरत पे दिल आ गया उसपे निसार है सब
मेरी यह उम्र, यह जान, यह यौवन

रंग-बिरंगे फूल खिले ख़ुशबू बिखरी हर-सू
मन की तितली फिरती है गुलशन-गुलशन

प्यार का जादू अब हम समझे क्या होता है
हम-तुम दोनों जैसे पानी और चन्दन

अब्रे-मेहरबाँ एक फ़साना रहा मुझको
चन्द्रमा खो गया जिसमें मेरी बढ़ा के लगन

वादा-ए-निबाह न किये फिर भी टूटे मुझसे
है नसीब मुझको बिन चाँद यह स्याह गगन

तेरी नज़र ने ज़िबह किया बारहा मुझको
रहा ताउम्र मुझ पर तेरा ही पागलपन

‘नज़र’ तेरी मेहर को बैठा है आज तलक
मरासिम बना के मुझसे जोड़ लो यह बन्धन


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

अंधी ख़ला में

हमने तो कभी दिल की अंधी ख़ला में
किसी चाँद को रोशन होते नहीं देखा

शायद आतिशी इंतकाल था सितारे का


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

चाँद गवाह है मेरे प्यार का

चाँद गवाह है मेरे प्यार का
क्या यही ख़्याल है, मेरे यार का
कुछ न ख़बर हुई उस पल की
कुछ न पता चला उस पल का
उसके चेहरे पर नज़र रुकी
क्या ख़बर क्या गया, क्या मिला

हर लम्हा इन्तज़ार नये ख़ाब का
क्या ऐसा ही हाल है मेरे यार का
जाने ना मिलें या न मिलें
उनसे हम कभी दोबारा
जाने फिर खिले या न खिले
वह गुलशन देखा हुआ नज़ारा

चाँद गवाह है मेरे प्यार का
क्या यही ख़्याल है, मेरे यार का

मैंने जिसे चाहा उसने मुझे चाहा
इस बात की ख़बर नहीं
बहती हवा भी मुँहज़ोर नहीं
तन में तपिश करती है चाँदनी
यह असर है पहले प्यार का
क्या ऐसा ही हाल है मेरे यार का

चाँद गवाह है मेरे प्यार का
क्या यही ख़्याल है, मेरे यार का

दिल में दर्द की आतिश जल रही है
तुम्हें पाने की चाहत बढ़ रही है
दिल मेरा बेताब है
जाने कहाँ दमका माहताब है
ऐसा रूप-रंग है मेरे यार का
रोशन कर दे दिल जाँनिसार का

चाँद गवाह है मेरे प्यार का
क्या यही ख़्याल है, मेरे यार का


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

मेरी राहों की रेत पर

मेरी राहों की रेत पर उसके पैरों का निशाँ नहीं है
वह गुज़रा नहीं इधर से पर मोहब्बत कम नहीं है

आज़माना है तो आज़मा ले हम भी तेरे बेताबी हैं
जलाकर सब राख कर दें हम वह आतिशबाजी हैं

एक दिन तुम्हें अपना बना लेंगे, अपना बना लेंगे
अपनी साँसों में बसा लेंगे, साँसों में बसा लेंगे
अपनी मुहब्बत की शमा तुम्हारे दिल में जला देंगे
तुम हो हमारी सिर्फ़ हमारी यह सबको जता देंगे…

मेरी राहों की रेत पर उसके पैरों का निशाँ नहीं हैं
वह गुज़रा नहीं इधर से पर मोहब्बत कम नहीं है

तुमसे दिल लगाया है तुमसे ही दिल जलाया है
तुम पर दिल आया है तुमसे ख़ाब सजाया है
मन में जो आग जल रही है उसे बुझने न देंगे
दूसरा कोई तुम्हें छू सके वह दिन आने न देंगे

आज़माना है तो आज़मा ले हम भी तेरे बेताबी हैं
जलाकर सब राख कर दें हम वह आतिशबाजी हैं

एक दिन तुम्हें अपना बना लेंगे, अपना बना लेंगे
अपनी साँसों में बसा लेंगे, साँसों में बसा लेंगे
तुम्हारे साथ ख़ुद को जला देंगे, ख़ुद को जला देंगे
अपनी साँसों में बसा लेंगे, साँसों में बसा लेंगे

मेरी राहों की रेत पर उसके पैरों का निशाँ नहीं हैं
वह गुज़रा नहीं इधर से पर मोहब्बत कम नहीं है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही
वह जो है माहे-कामिल है वही

मुझको तो इख़लास है उसी से
ख़ुदा मुझसे संगदिल ही सही

अजनबी है जी मेरा मुझसे ही
वह दर्द से ग़ाफ़िल ही सही

चश्मे-तर से न बुझी आतिश
यह दाग़े-तहे-दिल ही सही

मरहम न करो घाव पर मेरे
चाहत मेरी नाक़ाबिल ही सही

अंजाम की परवाह है किसको
सीने में शीशाए-दिल ही सही

उफ़ तक न की जाये तेरे ग़म में
नालए-सोज़े-दिल है यही

बोले है तेरा इश्क़ सर चढ़के
ख़ुद में मुकम्मिल है यही

चाँदनी रिदा है रोशनाई आज
शाम को सुबह के साहिल ही सही

अफ़सोस किस बात का नज़र
तमाम उम्र का हासिल है यही


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३