उसने हमसे कभी वफ़ा न की

उसने हमसे कभी वफ़ा न की
और हमने भी तमन्ना न की

बहुत बोलते हैं सब ने कहा
सो आदत-ए-कमनुमा न की

बहुत आये बहुत गये मगर
जान किसी पर फ़िदा न की

उसने कही और हमने मानी
उसकी कोई बात मना न की

ख़ता-ए-इश्क़ के बाद हमने
फिर कभी यह ख़ता न की

बात थी सो दिल में रह गयी
सामने पड़े तो नुमाया न की

जिससे मुँह फेर लिया हमने
फिर कभी बात आइंदा न की

उम्मीद मर गयी सो मर गयी
वह बाद कभी ज़िन्दा न की

चोट दोस्ती में खायी है ‘नज़र’
किसी से नज़रे-आशना न की


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मैं सबसे बुरा था

मैं सबसे बुरा था
सबसे बुरा हूँ
सबसे बुरा ही रहूँगा
मैं जी रहा था
जी रहा हूँ
ऐसे ही जीता रहूँगा

उसने मुझको सदा ख़ुशबू के
इक बादल के पार देखा
और मैं चाह कर भी कभी
उसको इस तरह न देखूँगा

मैं सबसे बुरा था
सबसे बुरा हूँ
सबसे बुरा ही रहूँगा

आईने उसकी आँखों के
मुझको ढूँढ़ते रहे, जाने क्यों?
और मैं अक्स उन आईनों का
कभी भी न बनूँगा…

मैं जी रहा था
जी रहा हूँ
ऐसे ही जीता रहूँगा

इक मतलब ही तो है
मुझसे जुड़ता हर नया रिश्ता
और मैं ऐसे रिश्तों से कभी
कोई जज़्बात न रखूँगा…

मैं सबसे बुरा था
सबसे बुरा हूँ
सबसे बुरा ही रहूँगा

हर शै पर हुक़ूमत करना
मेरी सबसे बुरी आदत है
और मैं अपनी यह आदत
जानकर भी न बदलूँगा…

मैं जी रहा था
जी रहा हूँ
ऐसे ही जीता रहूँगा

अच्छा या बुरा जो भी समझो
यह तुम्हारी अपनी सोच है
और मैं किसी के लिए
ख़ुद को कभी न बदलूँगा…

मैं सबसे बुरा था
सबसे बुरा हूँ
सबसे बुरा ही रहूँगा

वह किसी ग़ैर के पास जाता है
तो चला जाये, बेपरवाह!
और मैं उसके बेवफ़ा रुख़ का
कभी अफ़सोस न करूँगा…

मैं जी रहा था
जी रहा हूँ
ऐसे ही जीता रहूँगा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला
मुझको हर गाम नीचा दिखाके क्या मिला
हर वक़्त इम्तिहान और बस इम्तिहान
मुझको राहे-ख़ुदा में और कुछ भी न मिला

ख़ाली सीने में दर्द ही ज़मीं दर्द ही आसमाँ
दूर तक राहों में दर्द के निशाँ बस निशाँ
बाहर आ गया जिगर फाड़ के क़तराए-लहू
ऐ ख़ुदा तूने दिया मुझको किस बात का सिला

हँसना मुझे रक़ीब का’ तीर-सा लगता है
रखे अगर वह बैर मुझसे रखता है
जाने उसकी आँखों में मैं खटकता हूँ कि नहीं
ऐ ख़ुदा हर बार मैं ही क्यों मूँग-सा दला

राहे-इश्क़ में मुझे पत्थर का दिल नहीं
ज़ीस्त यह गँवारा मुझे बिल्कुल नहीं
मैं ख़ुदा को किसका वास्ता देकर कहूँ कि बस!
ख़ुदा-ख़ुदा कहने से हासिल कुछ भी न मिला

अपने ज़ख़्मों पे ख़ुद आप मरहम रखूँ
यह दर्द अगर कहूँ तो आख़िर किससे कहूँ
बात-बात पे ख़ुद से बिगड़ना आदत बन गयी
दरबारे-ख़ुदा से मुझको कुछ भी न मिला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

ग़म देना उनकी फ़ितरत

ग़म देना उनकी फ़ितरत में शामिल होगा
मेरी फ़ितरत तो मुहब्बत देने की रही है

दूर रहना उनकी आदत में शामिल होगा
मेरी आदत तो ख़ुशबू लुटाने की रही है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१

जो होता है भले के लिए होता है

जो होता है भले के लिए होता है
ख़ुद को समझने के लिए होता है

इंसान की आदत है बदल जाना
कि वह बदलने के लिए होता है

वक़्त रुका है कब किसके लिए
आदतन चलने के लिए होता है

सच-झूठ का दुनिया में है हिसाब
मुँह पर कहने के लिए होता है

माहिर एक तू ही नहीं ज़ीस्त का
बहाना यह जीने के लिए होता है


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००३