मेरा यह दर्द ख़त्म हो जाये कभी

मेरा यह दर्द ख़त्म हो जाये कभी
जो दुआ में तू मुझे माँग पाये कभी

टूट चुके हैं मेरी तमन्ना के दोश
तू ख़ुद संभाला देने को आये कभी

कबसे गया है न आया आज तक
मेरी आरज़ू तुझे खींच लाये कभी

ख़ुदाया मैं भटक रहा हूँ सहराँ में
कोई इस तस्कीं को मिटाये कभी

ग़मगीन शाम है और उदास हम
क्यों गुफ़्तगू का मौक़ा आये कभी

हमसे उल्फ़त किये बनती नहीं
मोहब्बत राहे-जुस्तजू पाये कभी

ख़स्ता हाल है दिल बहुत तेरे लिए
तुझे मजमूँ यह समझ आये कभी

तस्वीर मुझसे बात करती नहीं
तेरा यह दीवाना सुकून पाये कभी

तेरी कशिश भरी एक नज़र इधर
दिल पर अपना जादू चलाये कभी

तुम न जानो मेरे प्यार के बारे में
और ख़ुशबू तेरा पयाम लाये कभी

पहली नज़र से जो हसरत है मुझे
काश ख़ूबरू उसे समझ पाये कभी

दोश : कंधा, shoulder | मजमूँ : विषय, subject | ख़ूबरू : सुन्दर चेहरे वाला, beautiful


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

काश यह सन्दली शाम महक जाती

काश यह सन्दली शाम महक जाती
सबा* तेरी ख़ुशबू वाले ख़त लाती

तुझसे इक़रार का बहाना जो मिलता
मेरी क़िस्मत शायद सँवर जाती

दीप आरज़ू का जलता है मेरे लहू से
काश तू इश्क़ बनके मुझे बुलाती

दूरियाँ दिल का ज़ख़्म बनने लगीं हैं
होता यह नज़दीकियों में बदल जाती

सबा: ताज़ा हवा, breeze


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

काश कि फिर वह सहर आती

काश कि फिर वह सहर आती
जब तू मुझे नज़र आती

तेरी आरज़ू है मुझे रात-दिन
कभी तू इस रहगुज़र आती

पलकें सूख गयीं राह तकते
तेरी कोई खोज-ख़बर आती

दरम्याँ रस्मो-रिवाज़ सही
तू फिर भी इधर आती

सहाब दिखे हैं सूखे दरया पे
कभी बारिश भी टूटकर आती

मौतें मरकर मैंने देखी हैं
कभी ज़िन्दगी मेरे दर आती

क़रार आ जाता पलभर के लिए
मेरे ख़ाबों में तू अगर आती

सहर: संध्या, सुबह, dawn, morning | सहाब: बादल, clouds


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

ज़ियाँ दिल का किया

ज़ियाँ दिल का किया जो तुमसे लगाया
तो पल-पल सीने में धड़कता क्या है?

तेरी आरज़ू मुझे कहाँ बहा ले जा रही है?

ज़ियाँ = loss


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

चुपके से दिल को दिया

चुपके से दिल को दिया
चुपके से दिल को लिया
छल्ला बनाकर उँगली में पहन लिया

रात-दिन चूमती हूँ इसे
रात-दिन चाहता हूँ तुम्हें
पास जो तुम आ गये सब मिल गया

सब्ज़ मौसम हसीं आँखों में खिल गये
प्यार में तुम हमें ऐसे जो मिल गये
ख़ाब सारे अपने सच हो गये चुपके से

नाज़ तुम्हारा एक अदा है
दिल तुम पर फ़िदा है
जादू यह तुम्हारे, सब हैं हुस्न के शरारे

तुम्हारी आँखों के तीर
मेरे दिल को जाते चीर
हम मिट गये तुम्हें छू लिया चुपके से

बहकी हुई हैं धड़कनें, बदली हैं ख़ाहिशें
आरज़ू तुम्हारी थी, जुस्त-जू पूरी हो गयी
हमें सब कुछ हासिल हो गया चुपके से


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३