जो मुझे होता है वह दर्द तुझ तक पहुँचे

जो मुझे होता है वह दर्द तुझ तक पहुँचे
यूँ इस ख़ला की यह गर्द तुझ तक पहुँचे

की है इस दिल ने सदा तुझसे मोहब्बत
सादा-सादा इक यह फ़र्द तुझ तक पहुँचे

धूप सारे आलम में महकी हुई है हर-सू
कि मेरे सीने की यह सर्द तुझ तक पहुँचे

चमन-चमन में है आज मौसम-ए-बहार
कभी यह मौसम-ए-ज़र्द तुझ तक पहुँचे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

अपनी क़िस्मत पे नाज़ करते

अपनी क़िस्मत पे नाज़ करते, ग़ुरूर होता
जो कभी तेरे लबों से हमारा मज़कूर होता

अगरचे हमने छुपाया राज़े-दिल तुम से
डर था तेरी निगाह में यह ना क़ुसूर होता

तुमसे कुछ न कहा इसमें ख़ता हमारी थी
बताता दर्दे-हिज्र जो ना मजबूर होता

क़िस्सा-ए-इश्क़ मुख़्तसर था बहुत
इक और मोड़ होता तो ज़रा मशहूर होता

तुमने मुझे देखकर जाने क्या सोचा होगा
काश मैं शक्ल से ख़ूबसूरत थोड़ा और होता

क्या हम ना पाते अपनी मोहब्बत को
गर हमें अपनी वक़ालत का शऊर होता

हम-तुम मिल ही जाते सनम इक रोज़
जो इश्क़ में आशिक़ों का मिलना दस्तूर होता

हैं आलम में वही रंग नये-पुराने, यादों के
तुम भी होते परेशाँ तो मज़ा ज़रूर होता

तड़प-तड़प के मैंने यह ग़ज़ल लिखी है
काश मेरी क़िस्मत में वह जमाले-हूर होता

पल-पल बिगड़ रहा है हाल तेरे बीमार का
ऐ ‘नज़र’ काश कि आज को वह न दूर होता


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००

यह मौसम है मस्त-मस्त

यह मौसम है मस्त-मस्त
यह आलम है मस्त-मस्त
अम्बर पे छायी काली घटा
सावन बरसे कर दे मस्त

यह मौसम है मस्त-मस्त
यह आलम है मस्त-मस्त

तन भीगेगा मन भीगने दे
मन भीगेगा तन भीगने दे
डोल-डोल जा झूम-झूम जा
गा रही रिया गा रहा जिया

गाये कोयलिया कुहू-कुहू
बोले पपीहरा पिहू-पिहू
सात सुरों में बंधी पायलिया
मन को कर दे मद्-मस्त

यह मौसम है मस्त-मस्त
यह आलम है मस्त-मस्त
अम्बर पे छायी काली घटा
सावन बरसे कर दे मस्त

यह मौसम है मस्त-मस्त
यह आलम है मस्त-मस्त

बाग़िया में कोंपल हैं फूले
पेड़ों की डालों पर डाले झूले
रंग चढ़ा है जोबन का
जो न उतरे कर दे मस्त

यह मौसम है मस्त-मस्त
यह आलम है मस्त-मस्त
अम्बर पे छायी काली घटा
सावन बरसे कर दे मस्त

यह मौसम है मस्त-मस्त
यह आलम है मस्त-मस्त


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

खिले इस तरह तेरे रंग और रूप

खिले इस तरह तेरे रंग और रूप
जैसे सर्दियों की भीनी-भीनी धूप

अब यह आलम है दिलो-ज़हन का
करता हूँ हर शै में तुझे महसूस


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३-२००४