मैं बहुत तन्हा रहा, बिगैर तेरे ज़िन्दगी

मैं बहुत तन्हा रहा, बिगैर तेरे ज़िन्दगी
साँसों में हर ग़म पिरोया, बिगैर तेरे ज़िन्दगी

सब कुछ खोया कुछ न पाया इस दुनिया में
पल-पल मैं तड़पा, बिगैर तेरे ज़िन्दगी

आसमाँ ओढ़े बैठी रही तेरे लिए इक सदी
न रोशनी न चन्द्रमा, बिगैर तेरे ज़िन्दगी

बहती रही तेरे ही जानिब, ज़मीं इश्क़ में
न’असरकार रही दुआ, बिगैर तेरे ज़िन्दगी

हम खिंचे चले जाते हैं किस ओर क्या पता
हर तरफ़ नया चेहरा, बिगैर तेरे ज़िन्दगी

ऊदी हुई आँखों में नम है एक पुराना मौसम
हर साँस में लिपटा हुआ, बिगैर तेरे ज़िन्दगी

था बहुत सख़्तजान तेरा यह उम्मीदवार
‘नज़र’ नाचार हुआ, बिगैर तेरे ज़िन्दगी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

आज यह दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है

आज यह दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है
जब तुम हो फिर किसकी ज़रूरत है

देखो नीले आसमाँ पर चाँद खिल गया
सनम मुझको जब तेरा साथ मिल गया
अब रात-दिन आँखों में तेरी सूरत है
आज यह दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है

रंग-बिरंगे फूल, हर-सू खिलते हैं
जब दो प्यार करने वाले मिलते हैं
आ प्यार करें, क्या ख़ूब महूरत है
आज यह दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है

उस दिन जब तुम गुलाबी लिबास में थी
यूँ लगा जैसे कोई कली ख़ुशबाश में थी
तेरे लिए दिल में हर पल अक़ीदत है
आज यह दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है

मेरी नज़र ने सनम जो तुझे छू लिया
एक अजनबी-सा ख़ाब सच कर लिया
अब यूँ ही होती मुझको मसर्रत है
आज यह दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है

मसर्रत: ख़ुशी, happiness । हर-सू: सभी तरफ़, in vicinity


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मैं क्यों आज तक उसकी ख़ाहिश करता हूँ

मैं क्यों आज तक उसकी ख़ाहिश करता हूँ
जो मुझको भीड़ में अकेला छोड़कर गया है
सुबह आज भी उसको आइनों में जोड़ता हूँ
जो मेरे दिल को खिलौने-सा तोड़कर गया है…

बे-तस्कीनियाँ उजले चेहरों से बढ़ती हैं
हर पल मुझको अक्स की तरह पढ़ती हैं
अंधेरी रात है मैं छत पर तन्हा बैठा हूँ
एक-एक पल दोपहर-सा गुज़र रहा है…

कोई उठाये मुझको या फिर बैठा रहने दे
ख़ाबों के जंगल जलाये ना, धुँआ उड़ाये ना
ख़ाहिशों का अम्बार है, दिल ज़ार-ज़ार है
आँखों की नदिया सुखाये ना, चाँद जलाये ना

अजीब धुनकी में है दिल और कुछ नहीं है
दर्द का ग़ुबार है दिल और कुछ नहीं है
मुस्कुराहट जब खिली गुलाबी लबों पर
एक हसीन ख़ाब सारी रात जागता रहा है…

एक नयी परवाज़ दिखायी दी है आसमाँ में
कुछ नये अन्दाज़ भी हैं उसकी ज़बाँ में
बाँट नहीं सकता किसी से लम्हों के टुकड़े
ख़ुदाया मेरा कोई नहीं इतने बड़े जहाँ में


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

आहिस्ता-आहिस्ता नज़दीकियाँ बढ़ने लगीं

आहिस्ता-आहिस्ता नज़दीकियाँ बढ़ने लगीं
आहिस्ता-आहिस्ता तुमसे राहें जुड़ने लगीं
आहिस्ता-आहिस्ता तुमसे प्यार हो गया
आहिस्ता-आहिस्ता दोनों निगाहें लड़ने लगीं

तुमसे कहना था संग तेरे जीना है मुझको
प्यार को तुम्हारी आँखों से पीना है मुझको
ज़िन्दगी क्या है तुमसे मिलके जाना मैंने
सिवा तुम्हारे दिल के’ चैन कहीं न है मुझको

वह पहली नज़र और वह दिलकश समाँ
वह हुस्नो-अदा और वह मौसम ख़ुशनुमा
बदला-बदला है सब कुछ आज भी यहाँ
यह दिल, यह धड़कन, यह नीला आसमाँ

तुमने दिल लेकर मेरा क्यों न अपना दिया
हाँ मेरी ज़िन्दगी को इक नया सपना दिया
तेरी चाहत सनम मेरी क़िस्मत बन गयी
जो आशिक़ तुमने मुझको अपना बना दिया


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

तुम्हारी ख़ुशबू से महक उठा है मन

तुम्हारी ख़ुशबू से महक उठा है मन
तुम्हारे तस्व्वुर से भर आये नयन
बरखा की मखमली फुहार से जी तर है
धीरे-धीरे बुझ रही है दर्द की सूजन

लहू फिर ज़ख़्मे-जिगर से बहा है
दर्द तुम्हारा दिल में मेहमान रहा है
सर्द है बरसों से यह ख़िज़ाँ का मौसम
ज़र्द पत्तों में खो गया है कहीं गुलशन

बहार की नर्म धूप कहीं खो गयी है
मानूस वह चाँदनी किसी छत पे सो गयी है
यह उदास फ़ज़िर भी कितनी तवील है
दिखता नहीं दूर तक उफ़क़ का रोगन

तुमको पहली नज़र से चाहा दिलो-जाँ से
हर दुआ में मैंने तुमको माँगा आसमाँ से
मेरी मंज़िल मेरी मोहब्बत हो तुम
कैसे भी तुम मेरी बनो, जुड़ जाये बन्धन


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४