गेरुआ तेरे नयना, मस्जिद हैं या जाम

दोहे: 13,11

हृदय को ये तड़पायें, लुटा चैन आराम
गेरुआ तेरे नयना, मस्जिद हैं या जाम
Hruday ko yeh taRpayein, lutaa chain aaraam
geru’aa tere nayanaa, masjid hain ya jaam

बहल जायेगा दिल भी, सुनकर तेरा नाम
बदरा बरसे धरा पर, सूखी पुरनम शाम
bahal jaayega dil bhii, jo liyaa teraa naam
badaraa barse dharaa par, sookhii pur’nam shaam

प्यार करके डर कैसा, होगे क्यों बदनाम
मीठे बोल दो बोलो, ये तो है इल्हाम
pyaar karke Dar kaisaa, hoge kyo’n bad’naam
meethe bol do bolo, ye to hai il’haam

मंदिर में बैठा रहा, मैं पहने एहराम
दुख मैंने कितना सहा, अब तो ला दे जाम
mandir mein baiTha rahaa, main pahne ehraam
dukh maine kitna sahaa, ab to laa de jaam

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Poet: Vinay Prajapati ‘Nazar’
Penned: 22:15 29-08-2013

तस्व्वुरे-हुस्नो-सादगिए-‘शीना’

सुबह-सा चेहरा, माथे पर सूरज-सी बिन्दिया
हँसी, जैसे ख़ुशबू हो कोई, गुनगुनाती हुई
आँखें साँवली-सी, कजरारी-सी
ऐसे झुकती और खुलती थीं
जैसे रात पे सुबह का दरिया बहा दिया हो
वह लट जब चेहरे पर गिरती थीं
यूँ लगता था मानो! बादल की ओट में चाँद हो

उसके पाँव की आहट जैसे बादे-सबा फूलों पर
रूप की सादगी ऐसी जैसे सूफ़ी का तस्व्वुर
रंग बिल्कुल गुले-अंदाम ज़रा-सी बनावट नहीं
लब सुर्ख़ थे ऐसे, जिस तरह गुलाब के पैमाने
ज़ुबाँ नाज़ुक मिज़ाज, वाइज़ो-नासेह की तरह
बदन शीशे जैसा, साफ़-शफ़्फ़ाक़-गुल्फ़ाम
अदा में जुज़ सादगी और कुछ नहीं झलकता था

मालूम नहीं, वह बरस ख़ाब का था कि सच था
उसका वह मेरे घर आना
काँधे से गिरते वह कमर पे दुप्पटे की गाँठ
वह दीपावली के दिए, वह सजावट सब
देखना उसे मेरा एक टुक, सुबहो-शाम, रोज़
वह तूफ़ान जी का, कुछ करके दिखा दें
लिखना तेरा नाम दरो-दर पर, आदतन

आज पाँच बरस हो गये…
I’m still reminiscing about you…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३-२००४

काश वह कोई गुल होती

काश वह कोई गुल होती
मैं उसे अपने लबों से चूम लेता
गर वह कोई आइना होती
मैं ख़ुद को उसमें उतार देता

इश्क़ जला है कितनी रातों तक
कोई समझता दर्द मैं बता देता


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१

दिल में तेरे लिए सच्ची अक़ीदत है

है जो किसी से तुम्हें तो गुल से निस्बत है
तुम मुझको मिले हो यह मेरी क़िस्मत है

तेरे तब्बसुम से ही है यह रंगे-बहार
लगता है अब जैसे सारी फ़िज़ा जन्नत है

तेरी आँखों की गुलाबी डोरियाँ जैसे नश्शा-ए-मै
तिश्ना-लब हूँ मुझे पीने की हसरत है

तेरी ज़ुल्फ़ों से गुज़रते देखी है मैंने सबा
हाए! यह सबा भी कितनी खु़श-क़िस्मत है

तेरे अबरू मानिन्दे-कमान उठते हैं
मुझको तेरे आगोश में मरने की चाहत है

तेरे लब हैं की पंखुड़ियाँ गुलाब की हैं
इक बोसा पाने को शबो-रोज़ की मिन्नत है

सुना है जन्नत की हूरों के बारे में बहुत
मगर उनमें कहाँ यह कशिशे-क़ामत है

देखा है तुमने कभी चाँद को सरे-शाम
एक वही है जो तेरी तरह खू़बसूरत है

हो तुम ही मानिन्दे-खु़दा मेरे लिए
इस दिल में तेरे लिए सच्ची अक़ीदत है

तुम क़रीब होते हो दर्द मिट जाते हैं
तुमसे ही मुझको होती नसीब फ़रहत है

तुम्हें देखा तो मैंने अपनी ज़िन्दगी देखी
तुमको चाहना ही खु़दा की इबादत है

मेरा दिल जितना चाहता है तुमको सनम
तुम्हें भी मुझसे उतनी ही मोहब्बत है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २६/०७/२००४

तख़लीक़ हुआ है यह विनय

मेरे ही हाथों में टूटा है दम मेरा,
तेरे ही स्पर्श से तख़लीक़ हुआ है
यह ‘विनय’

अभी-अभी मेरी मुट्ठी में
जन्मी है यह क़िस्मत
खुलेगी जो कई और कई
हासिलों के मुक़ाम आयेंगे

जिससे मेरी हर सोच जुड़ी है
वह सिर्फ़ एक तुम्हीं हो
मेरी इब्तिदा, ये ख़ुशगँवारियाँ
सब तुम्हीं से तो हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३