दिल पर होने लगा इक अंजाना असर

दिल पर होने लगा इक अंजाना असर
खोने लगी है हर शाम मेरी नज़र
गौर से कभी उसको देखा नहीं फिर भी
पहचान लूँगा चेहरे हज़ार हों अगर

आते-जाते मिल ही जाती है नज़र
और थम जाती है दिल की अनबन
जो यह बेज़ुबाँ दिल नहीं कहता है
वह कह देती है मिलते ही नज़र

आज तक जान-पहचान हुई नहीं है
फिर भी प्यार छा गया है दिल पर
दिल पर होने लगा इक अंजाना असर
खोने लगी है हर शाम मेरी नज़र

सपनों की महकने लगी हैं सारी गलियाँ
इश्क़ की महकने लगी हैं सारी कलियाँ
शाम के जाम हमने आँखों से पिये
जो उसने प्यार से भरकर हाथों में दिये

अभी अपनी बात आँखों की आँखों में है
इसलिए रहने दो जहाँ को बे-ख़बर
दिल पर होने लगा इक अंजाना असर
खोने लगी है हर शाम मेरी नज़र


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

दिल से मेरे जो पहली नज़्म निकली थी

दिल से मेरे जो पहली नज़्म निकली थी
वह तेरे लिए थी सखी वह तेरे लिए थी

तेरे मेरे ख़ाबों की ज़मीं पर सखी
जब इश्क़ की ख़ुशबुएँ उड़ी थीं
उससे पहले लगता था ऐसे
आँखों में पानी की बूँदें जड़ी थीं

काँच की थीं वह सब आहें
जो उस पल दिल में टूटी थीं
फूलों से भी ज़्यादा नरम थीं
जो डोरियाँ, इस दिल में टूटी थीं

दिल से मेरे जो पहली नज़्म निकली थी
वह तेरे लिए थी सखी वह तेरे लिए थी

पहली-पहली बार मेरी आँखों में
तेरी तस्वीर जिस दिन बनी थी
उस दिन यहाँ तपती बर्फ़ पर
तेरी राह की सर्द रेत पिघली थी

सूख चुकी थीं वह सारी कलियाँ
जो इस दिल में खिली थीं
बिल्कुल अन्जान थीं वह दोनों राहें
जो एक-दूसरे से कभी मिली थीं

दिल से मेरे जो पहली नज़्म निकली थी
वह तेरे लिए थी सखी वह तेरे लिए थी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९