क्यों बेशर्म क़तरा-क़तरा ज़हन नहीं ढलता

क्यों? बेशर्म क़तरा-क़तरा ज़हन नहीं ढलता
क्यों? मुझे बेक़रारियों से क़रार नहीं मिलता
क्यों? ढल रहा हूँ दिल में ख़ुद के ही, आज!
क्यों नहीं हूँ कोशिशे-इश्क़ में, ख़ुद के ही आज?
मग़रूर तो हूँ मैं, मजबूर भी हूँ, ऐसा क्यों?
आज तक बेकसूर भी हूँ मैं, न जाने ऐसा क्यों?

पनाह दे दे, पाँव में किसी के जगह दे दे, मुझे
भटकता हुआ ख़ुद ही बीन रहा हूँ अपने टुकड़े!


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले

कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले
कभी तेरे आगोश में पनाह मिले
मैं शज़रे-धूप की छाँव में बैठा हूँ
कभी तो इनायते-निगाह मिले

तुम हाथ तो बढ़ा दो मेरे मसीहा
ज़ख़्मों पे रख दो मरहम का फीहा
बेबसी में मेरा दम घुटने लगा है
फिर से सौंधी हुई सुबह मिले

रुख़े-ख़ुशी मेरी तरफ़ मोड़ दो
मेरे दर्द का हर तागा तोड़ दो
एक ही ख़ाहिश है मेरी बरसों से
तेरे दिल में मुझे जगह मिले

मैं अपनी कोशिशों में रहूँ क़ाबिल
इस दरिया को मिले तेरा साहिल
तुम्हीं से ज़िन्दगी को मानी मिला है
काश कि तेरी-मेरी हर राह मिले

मुश्किलें सब यह आसाँ हो जायें
जो हम दो जिस्म एक जाँ हो जायें
लम्हों में सदियाँ तय कर चुका हूँ
तेरा-मेरा दिल किसी तरह मिले


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

हाल दिल का बताना तुमसे

हाल दिल का बताना तुमसे बहुत ही मुश्किल है
न जाने कितना, बेशुमार दर्द इसमें शामिल है
हर लम्हा ज़िन्दगी को ज़िन्दगी से दूर करता है
जाने किस रफ़्तार दोनों का दिल शोर करता है

जाने अन्जाने मुझसे कितनी गुस्ताखियाँ हो गयीं
हम क्यों समझ न पाये और आप दूर होती गयीं 
थोड़ी-थोड़ी दोस्ती न जाने कब मोहब्बत बन गयी
एक फूल खिला और सारी फ़िज़ा जन्नत हो गयी

हाल दिल का बताना तुमसे बहुत ही मुश्किल है
न जाने कितना, बेशुमार दर्द इसमें शामिल है

वही समझता है यह इश्क़ जो इश्क़ का मारा है
समझे पाये बहुत देर से हम, यह कच्चा सहारा है
पलकें भारी हो जाती हैं कोशिश करते हैं जागने की
कैसी ज़िन्दगी है ज़रूरत पड़ती है साँसें माँगने की

हाल दिल का बताना तुमसे बहुत ही मुश्किल है
न जाने कितना, बेशुमार दर्द इसमें शामिल है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

मेरी मुहब्बत तो झूठी नहीं

मेरी मुहब्बत तो झूठी नहीं
अगर मैं झूठा हूँ
तुम जो गये हो यहाँ से
पल-पल मैं टूटा हूँ
किसी का एतबार नहीं करता
किसी को देखकर नहीं मरता
एक फ़ितरत-सी बन गयी है
हर पल तुम्हें याद करने की
तुम्हें भूलने की कोशिश में
हर पल तुम्हें क़रीब रखता हूँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१

जहाँ उस रोज़ देखा था तुम्हें [ver. 2.0]

बीते दिनों की गलियों में जब पाँव पड़ते हैं तो
अपने आपको तुझमें ढूँढ़ने लगता हूँ मैं
दिल के ज़ख़्म बर्फ़ की तरह जमने लगते हैं
और उदासियों की नज़्म उन्हें गरमाती रहती है…

मैं जानता हूँ पिछला कुछ भी बदला नहीं जा सकता
फिर भी ‘काश!’ की परछाईं मेरा पीछा नहीं छोड़ती
काश यूँ न होता, काश वैसा न किया होता, काश!
बस यही आवाज़ें मन में गूँजती रहती हैं…

सन्नाटों में झींगुर जाने किसको सदा देते हैं
चाँदनी ज़मीन पर जाने क्या ढूँढ़ती रहती है
मैं बंद कमरे में बैठा, खिड़की से बाहर देखता हूँ
तेरी यादें गली में टहलती नज़र आती हैं मुझे…

मेरी राह वही है जहाँ उस रोज़ देखा था तुम्हें
जब गुज़रता हूँ आँखें वही लम्हें ढूँढ़ती हैं
और हक़ीक़त के हाथ वहम के परदे उठा देते हैं
रह जाता दिल में गूँजता हुआ एक सन्नाटा…

मेरी ज़िन्दगी के पिछले सात पन्ने तुमने लिखे थे
जिनको मैंने अपने ख़ाबो-ख़्याल से सजाया था
कच्ची स्याही से लिखे वह लम्हों में बुने हर्फ़
लाख कोशिशों के बावजूद भूल नहीं पाया हूँ…

न मेरा नाम याद रखना, न मेरी चीज़ें सँभालना
न मेरी शक़्ल याद रखना, न मेरी वो बातें
तुम मुझे भुला दो बस यही दुआ करूँगा
याद आऊँ तो नाम न लेना फ़लाँ कह देना मुझे…

मुझको भूल जाने वालों को मैं भूल जाता हूँ
भीड़ में उनके चेहरे तक याद नहीं रखता मैं
तुम मेरा एक ख़ाब हो जिसे भूलना चाहता हूँ
और ज़हन से रोज़ यही इक बात उतर जाती है…

ख़ुदा तुम्हें मुझसे हसीन मुझसे ज़हीन कोई भी दे
और न दे तुम्हें तो कोई मेरे जैसा दीवाना
गो कि यकता हूँ मैं सारे ज़माने में
और तुम मुझ जैसा दूसरा ढूँढ़ नहीं पाओगी…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५