भीगी चाँदनी रातों में

भीगी चाँदनी रातों में
दिल से तेरी बातों में
ऐसा लग रहा है
तू मेरी बन गयी है
मैं तेरा बन गया हूँ

ख़ाब बुनती हैं आँखें
फूलों से लदी हैं शाख़ें
ऐसा लग रहा है
तू ख़ुशबू बन गयी है
मैं गुल बन गया हूँ

हल्की-हल्की आँच है
मेरी नब्ज़ में काँच है
ऐसा लग रहा है
तू लहू बन गयी है
मैं जिस्म बन गया हूँ

तारे, चिंगारियाँ हैं
चाँदनी, उजली बर्फ़ है
ऐसा लग रहा है
तू लौ बन गयी है
मैं दीप बन गया हूँ

लफ़्ज़ मीठे-मीठे हैं
ग़म फीके-फीके हैं
ऐसा लग रहा है
तू मिसरी बन गयी है
मैं ज़बाँ बन गया हूँ

दिल ग़मख़्वार है
मौसम ख़ुशगँवार है
ऐसा लग रहा है
तू दिल बन गयी है
मैं जाँ बन गया हूँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद यादों की सुनहरी धूप निकली
मैंने अपना बदन सेंका,
ख़्याल महके जब ज़हन पे जमी बर्फ़ पिघली
मैंने तस्वीरे-आज फेंका…

मालती की बेलें औराक़ पे हर्फ़ों की दीवार से लिपटीं
ख़ुशबू-ए-मिज़ाज रखके यह मेरी आँखों में सिमटीं

रोज़ रात शबनम में भीग जाती हैं सारी ख़ाहिशें जब
उड़ चलती है फ़ाख़्ता-ए-मन पुराने शहर की तरफ़

लफ़्ज़ों की मौज ने ली अँगड़ाई रिश्तों के बदन पे
मानूस चेहरों के चराग़ जल उठे ताक-ए-ज़हन पे

इन दिनों उड़ता फिरा हूँ मैं आँधी की तरह आवारा
लूटने के लिए वो पुराने मौसम पतंगों वाले दोबारा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

रोज़ सपनों में आता है

रोज़ सपनों में आता है
इन रातों में जगाता है
मैं क्यों न जानूँ उसको
मैं न पहचानूँ उसको

वह मुझसे अजनबी है
लेकिन मेरा हमनशीं है
मैं क्या नाम दूँ उसको
यह दिल दिया जिसको
उसके लिए दीवानी हूँ
उस चाँद की चाँदनी हूँ
जाने कब मिलूँगी उसे
महसूस करती हूँ जिसे

रोज़ सपनों में आता है
इन रातों में जगाता है
मैं क्यों न जानूँ उसको
मैं न पहचानूँ उसको

उसकी ख़ुशबू साँसों में
उसका चेहरा आँखों में
जाने कैसा नशा छाया
जाने कैसा जादू चलाया
वह हसरत बन गया
वह मोहब्बत बन गया
जाने कब मिलूँगी उसे
महसूस करती हूँ जिसे

रोज़ सपनों में आता है
इन रातों में जगाता है
मैं क्यों न जानूँ उसको
मैं न पहचानूँ उसको


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९