ज़ुलेख़ा

तुम्हें कई बार देखा है मैंने
सिंदूरी शाम पे रात मलते हुए
कई बार चाँद की तरह
चेहरा छुपा लेती हो
और कई बार पाया है
नदी किनारे तन्हा बैठे हुए

कुछ बातें भूली बिसरी याद करती हो
बरसे फिर वो चाँद की मिसरी
फ़रियाद करती हो

वो महकी हुई संध्या आज भी होगी
पलाश के फूलों में
खु़शबू भरने की खा़हिश आज भी होगी

हमेशा से खा़ब में तुम्हें देखा है
खा़हिश थी जिसकी तू ही वो ज़ुलेखा़ है
बेवजह ही धूप की परवाह करती हो,
खु़द ही गिला खु़द ही शिकवा करती हो

उन पलकों में नमी आज भी होगी
उनमें किसी दिलबर का खा़ब रखने की
खा़हिश आज भी होगी…

तुम्हें कई बार देखा है मैंने
सिंदूरी शाम पे रात मलते हुए…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

एक सफ़्हा

सुबह एक सफ़्हा, शाम एक सफ़्हा
दिन एक सफ़्हा, रात एक सफ़्हा

ज़िंदगी एक सफ़्हा,  साँस एक सफ़्हा
धूप एक सफ़्हा, छाँव एक सफ़्हा

खा़हिश एक सफ़्हा, आरज़ू एक सफ़्हा
खा़ब एक सफ़्हा, आँख एक सफ़्हा

बहार एक सफ़्हा, पतझड़ एक सफ़्हा
झूठ एक सफ़्हा, सच एक सफ़्हा

सूरज एक सफ़्हा, चाँद एक सफ़्हा
ग़ज़ल एक सफ़्हा, गीत एक सफ़्हा

खा़मोशी एक सफ़्हा, हँसी एक सफ़्हा
आँसू एक सफ़्हा, खु़शी एक सफ़्हा

दिल एक सफ़्हा, धड़कन एक सफ़्हा
जिस पर तेरी तस्वीर बनी है,
जिस पर तेरा नाम लिखा है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

क़तरा-क़तरा गलायेगा मेरे दिल को

आज महसूस किया मैंने
गर तुम्हें किसी और के साथ देखूँ
तो मेरे दिल पे क्या गुज़रेगी
कैसा महसूस करूँगा बाद उसके…

काँच-से कच्चे खा़ब किस तरह चूर होंगे,
किस तरह बिखरेंगे, छिटकेंगे मेरे ज़ख़्मों पर
मानिन्द काँच के टुकड़ों के…
अश्कों का खा़रापन किस तरह ज़ख़्मों से
मवाद बनके बहेगा
क़तरा-क़तरा गलायेगा मेरे दिल को
किसी लाश की तरह,
जिसे दर्दों की तह में
वक़्त की मिट्टी तले दबा दिया गया हो

आज महसूस किया मैंने एक डर
तेरी फ़ुरक़त का डर
तेरे दूर होने का डर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४