एक सफ़्हा

सुबह एक सफ़्हा, शाम एक सफ़्हा
दिन एक सफ़्हा, रात एक सफ़्हा

ज़िंदगी एक सफ़्हा,  साँस एक सफ़्हा
धूप एक सफ़्हा, छाँव एक सफ़्हा

खा़हिश एक सफ़्हा, आरज़ू एक सफ़्हा
खा़ब एक सफ़्हा, आँख एक सफ़्हा

बहार एक सफ़्हा, पतझड़ एक सफ़्हा
झूठ एक सफ़्हा, सच एक सफ़्हा

सूरज एक सफ़्हा, चाँद एक सफ़्हा
ग़ज़ल एक सफ़्हा, गीत एक सफ़्हा

खा़मोशी एक सफ़्हा, हँसी एक सफ़्हा
आँसू एक सफ़्हा, खु़शी एक सफ़्हा

दिल एक सफ़्हा, धड़कन एक सफ़्हा
जिस पर तेरी तस्वीर बनी है,
जिस पर तेरा नाम लिखा है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

और बहुत कुछ…

तुमसे चाहत है
तुमसे इबादत है
मुझे इश्क़ है तुमसे …

तुमको देखा तो जाना
प्यार क्या है ज़िन्दगी क्या है

तुमसे शुआ है
तुमसे फ़ज़िर है
फूल में महक है तुमसे …

तुमको देखा तो जाना
तमन्ना क्या है खा़हिश क्या है

तुमसे खु़शी है
तुमसे निबाह है
फ़रहत जवाँ है तुमसे…

तुमको देखा तो जाना
इल्म क्या है जन्म क्या है

और बहुत कुछ…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: जून/२००३

जब तक कोई आस उसे आकर पोंछ न दे…

ज़िन्दगी से सौ ग़म एक खु़शी मिलती है
अब तक जितनी राहों से गुज़रा हूँ,
ग़म उठाता रहा हूँ…
रूह छिलती रही है मेरी…

सीने की तह में…
जाने कितने ही ज़ख़्मों के टूटे शीशे और
घावों के जंग खाये हुए लोहे के टुकड़े जमा हैं
ज़रा दम भर को करवट लेता हूँ तो…
जोंक की तरह से सारे सबातो-सुकूँ चूसने लगते हैं

पलकें आँच के ग़ुबार से जल उठती हैं
आँख खुश्क और खुश्क होती जाती है
आँसुओं का इक सैलाब-सा उमड़ पड़ता है यकायक
दरिया बहता ही रहता है
जब तक कोई आस उसे आकर पोंछ न दे…

और खु़शी वह तो यक़ीनन तुम्हीं से है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४