हर वो शख़्स जिसको मैंने अपना ख़ुदा कहा

हर वो शख़्स जिसको मैंने अपना ख़ुदा कहा
बादे-मतलब उस ने मुझ से अलविदा कहा

जिसे मैं मानता हूँ धोख़ा-ओ-अय्यारी यारों
ज़माने ने उस को हुस्न की इक अदा कहा

वह प्यार जिस को एहसास कहते थे सभी
उसने आज उसको बदन की इक सदा कहा

मैं था उसके पीछे ज़माने की ग़ालियाँ खाकर
उस ने मुझे किसी ग़ैर हुस्न पर फ़िदा कहा

जिन आँखों का तअल्लुक मैं देता था मस्जिद से
उसे उस के यार ने महज़ इक मैक़दा कहा

मैं कहता था उससे अपने ज़ख़्मों की कहानी
उसने कुछ और नये ज़ख़्मों को तयशुदा कहा

सदा: पुकार, call; बादे-मतलब: मतलब पूरा होने के बाद, ; धोख़ा-ओ-अय्यारी: धोख़ा और चालाकी, cheating and cleverness; तअल्लुक: ताल्लुक, relation; मैकदा:शराबख़ाना, bar; तयशुदा:निश्चित, certain


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

वह चाँद वह सुहानी शाम फिर आये

वह चाँद वह सुहानी शाम फिर आये
गुलाबी आँखों का सलाम फिर आये

मैं भटक रहा हूँ अंधेरी गलियों में
चर्ख़ से वह इल्हाम फिर आये1

सुकूनो-सबात2 मेरा सब खो गया है
कैसे मेरे दिल को आराम फिर आये

बैठूँ जब मैं किसी बज़्मे-ग़ैर3 में
मेरे लबों पे तेरा नाम फिर आये

बहुत उदास है यह शाम का समा
शबे-दिवाली4 की धूमधाम फिर आये

मैं वह ऊँचाइयाँ5 अब तक नहीं भूला
वह मंज़िल वह मुकाम फिर आये

वह छुपके बैठा है दुनिया के पर्दे में
मुझसे मिलने सरे’आम फिर आये

दास्ताँ जो अधूरी रह गयी है ‘नज़र’
उसे पूरा करने वह’ मुदाम6 फिर आये

शब्दार्थ:
1. आसमाँ से ख़ुदा का आदेश फिर आये, 2. आराम और चैन, 3. ग़ैर की महफ़िल, 4. दीवाली की रात, 5. सफलता , 6. सदैव


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

ज़िन्दगी के दर्द बहुत ज़िन्दगी के काम आये

ज़िन्दगी के दर्द बहुत ज़िन्दगी के काम आये
जिनसे मतलब नहीं था हमें वो मुक़ाम आये

अपनों का कब हमें नसीब साथ दो क़दम हुआ
तसल्ली के हाथों हमें’ ग़ैरों के सलाम आये

क्या किसने किया यह हिसाब मैं किस-किस को दूँ
हर एक ज़ुबाँ से मुझको सैकड़ों इल्ज़ाम आये

वह कहेंगे अगर तो हम अपनी जान दे देंगे
वह नहीं आते तो क़ासिद के ज़रिए कलाम आये

हम में क्या है यह बात अगर वह जान लेंगे
फिर शायद वह क़ुर्बत की फ़ज़िरो-शाम आये

क़ासिद: डाकिया, Postman | क़ुर्बत: मिलन, Nearness | फ़ज़िर: भोर, Dawn


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

जो लोग अच्छे होते हैं दिखते नहीं हैं

जो लोग अच्छे होते हैं दिखते नहीं हैं
चाहने वाले बाज़ार में बिकते नहीं हैं

ख़ुद से पराया ग़ैरों से अपना रहे जो
ऐसे लोग एक दिल में टिकते नहीं हैं

सूरत से जो सीरत को छिपाये फिरते हैं
वो कभी सादा चेहरों में दिखते नहीं हैं

होता है नुमाया दिल को दिल से, दोस्त!
मन के भेद परदों में छिपते नहीं हैं

इन्साँ है वह जो जाने इन्सानियत
हैवान कभी निक़ाबों में छिपते नहीं हैं

वक़्त में दब जाती हैं कही-सुनी बातें
हम कभी कुछ दिल में रखते नहीं हैं

पलटते हैं जो कभी माज़ी के पन्नों को
ये आँसू तेरी याद में रुकते नहीं हैं

नहीं मरना आसाँ तो जीना भी आसाँ नहीं
चाहकर मिटने वाले मिटते नहीं हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मैं सबसे बुरा था

मैं सबसे बुरा था
सबसे बुरा हूँ
सबसे बुरा ही रहूँगा
मैं जी रहा था
जी रहा हूँ
ऐसे ही जीता रहूँगा

उसने मुझको सदा ख़ुशबू के
इक बादल के पार देखा
और मैं चाह कर भी कभी
उसको इस तरह न देखूँगा

मैं सबसे बुरा था
सबसे बुरा हूँ
सबसे बुरा ही रहूँगा

आईने उसकी आँखों के
मुझको ढूँढ़ते रहे, जाने क्यों?
और मैं अक्स उन आईनों का
कभी भी न बनूँगा…

मैं जी रहा था
जी रहा हूँ
ऐसे ही जीता रहूँगा

इक मतलब ही तो है
मुझसे जुड़ता हर नया रिश्ता
और मैं ऐसे रिश्तों से कभी
कोई जज़्बात न रखूँगा…

मैं सबसे बुरा था
सबसे बुरा हूँ
सबसे बुरा ही रहूँगा

हर शै पर हुक़ूमत करना
मेरी सबसे बुरी आदत है
और मैं अपनी यह आदत
जानकर भी न बदलूँगा…

मैं जी रहा था
जी रहा हूँ
ऐसे ही जीता रहूँगा

अच्छा या बुरा जो भी समझो
यह तुम्हारी अपनी सोच है
और मैं किसी के लिए
ख़ुद को कभी न बदलूँगा…

मैं सबसे बुरा था
सबसे बुरा हूँ
सबसे बुरा ही रहूँगा

वह किसी ग़ैर के पास जाता है
तो चला जाये, बेपरवाह!
और मैं उसके बेवफ़ा रुख़ का
कभी अफ़सोस न करूँगा…

मैं जी रहा था
जी रहा हूँ
ऐसे ही जीता रहूँगा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४