नै बुलबुले-चमन न गुले-नौदमीदा हूँ

नै१ बुलबुले-चमन न गुले-नौदमीदा२ हूँ
मैं मौसमे-बहार में शाख़े-बरीदा३ हूँ

गिरियाँ न शक्ले-शीशा व ख़ंदा न तर्ज़े-जाम४
इस मैकदे के बीच अबस५ आफ़रीदा६ हूँ

तू आपसे७ ज़बाँज़दे-आलम८ है वरना मैं
इक हर्फ़े-आरज़ू९ सो ब-लब१० नारसीदा११ हूँ

कोई जो पूछता हो ये किस पर है दादख़्वाह१२
जूँ-गुल हज़ार जा से गरेबाँ-दरीदा हूँ१३

तेग़े-निगाहे-चश्म१४ का तेरे नहीं हरीफ़१५
ज़ालिम, मैं क़तर-ए-मिज़ए-ख़ूँचकीदा१६ हूँ

मैं क्या कहूँ कि कौन हूँ ‘सौदा’, बक़ौल दर्द
जो कुछ कि हूँ सो हूँ, ग़रज़ आफ़त-रसीदा१७ हूँ

शब्दार्थ:
१. न तो, २. नया खिला फूल, ३. टूटी शाख़, ४. न शीशे की तरह से रो रहा हूँ और न जाम की तरह से हँस रहा हूँ, ५. व्यर्थ ही, ६. लाया गया, ७. स्वयं ही, ८. दुनिया की ज़बान पर चढ़ा हुआ, ९. आरज़ू का शब्द, १०. होंटो पर, ११. पहुँच से वंचित, १३. दाद चाहनेवाला, १४. फूल की तरह हज़ार जगह से मेरा गरेबान फटा हुआ है, १४. निगाहों की तलवार, १५. प्रतिद्वंदी, १६. ख़ून रो रही पलकों पर टिका हुआ क़तरा, १७. आफ़त में फँसा हुआ


शायिर: मिर्ज़ा रफ़ी ‘सौदा’

ख़ाली सीने में कुछ धुँआ-धुँआ-सा है

ख़ाली सीने में कुछ धुँआ-धुँआ-सा है
जिस सिम्त देखता हूँ दिल बदगुमाँ-सा है

दर्द को दर्द हो ऐसा होता नहीं
इसीलिए ख़ातिर में यह नौ-जवाँ-सा है

ख़ुदा ही मेहर से मैं रहा सदियों के फ़ासले पे
आज भी वह ना-मेहरबाँ-सा है

ढूँढ़ता हूँ मैं ख़ुद को उस गली में
जिसमें मुझे ज़िन्दगी होने का नुमाया-सा है

रोशनी में भिगो दिया शबे-महफ़िल को जिसने
तेरी रंगत का शुआ-सा है

एहसासात दफ़्न हैं किसी कब्र में
दर्द दिल का आज कुछ बे-ज़ुबाँ-सा है

खींच लिया जिगर को दाँतों से लब तक
आज महफ़िल में यह कमनुमा-सा है

तेरी दीद से बादशाहत मिली थी मुझे
ज़ख़्म कहता है तेरा साया हुमा-सा है

बदनसीबी गर्दिशे-अय्याम है बस
वक़्त यह एक इम्तिहाँ-सा है

तमाशा बहुत हुआ तेरे जाने के बाद
जो कुछ भी हुआ ज़ख़्मे-निहाँ-सा है

शज़र बेसमर हैं नकहते-गुल भी नहीं
मौसम यह ज़र्द ख़िज़ाँ-सा है

ज़ीस्त नवाज़ी गयी सो जी रहे हैं
मगर जीना मुश्किल मरना आसाँ-सा है

मैं गर तेरा तस्व्वुर करूँ
बूँद-बूँद शबनम का गिरना भी गिरियाँ-सा है

तुम नहीं गुज़रते इस राह से
मेरी गली का हर पत्थर रेगिस्ताँ-सा है

वह उजाले जिनसे चौंक गयीं थीं मेरी आँखें
मंज़र वह भी कहकशाँ-सा है

ना पूछ कब से तेरे दीवानों में शामिल हूँ
हाल मेरा भी कुछ-कुछ बियाबाँ-सा है

नीली शाल में लिपटी देखा था तुझे
तब से जाना कि चाँद किसी माहलक़ा-सा है

तुम आये घर मेरे आस्ताने तक
कि अब का’बा ही मेरे सँगे-आस्ताँ-सा है

इश्क़ में हमसा न पायेगा कोई
न होना मेरा उनकी बज़्म में हरमाँ-सा है

हम वस्ल की तमन्ना में मुए जाते हैं
ज़ुज तेरे सभी से वस्ल हिज्राँ-सा है

शगून तेरे देखने भर से होता था
आज इन आँखों में हर क़तरा टूटा-टूटा-सा है

बेज़ार है चमन तितली ज़र कैसे पिये
अब कि मौसम भी कुछ बेईमाँ-सा है

ज़हर हमको दिया दवा बता के ख़ुदा ने
ज़ीस्त जो बख़्शी यह भी सौदा-सा है

‘नज़र’ बातें हैं बहुत उसके इश्क़ो-ग़म में
जिसका दिल पर निशाँ-सा है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

वो जिसे इश्क़ कहता था

वो जिसे इश्क़ कहता था वाइज़1 हम उसमें फँस गये
बहाये इतने आँसू कि जहाँ खड़े थे वहीं धँस गये

न जिगर से लहू बहा न लब तक अपनी बात आयी
गिरियाँ2 दिल ही में बादल बने वहीं बरस गये

रह-रहके रूह छोड़ना चाहती थी इस ज़ोफ़3 बदन को
इतना चाहते हैं तुम्हें कि मरने तक को तरस गये

कोई पढ़ दे मेरा नसीब हमको क्या-क्या बदा4 है
हमें लगता है हम जहाँ-जहाँ भी गये अबस5 गये

किस तरह से भूलें तुमको किस तरह से भुलायें
दिल, जान, ख़्याल और तस्व्वुर6 में तुम बस गये

दिल लिया तुमने ग़म नहीं बारहा7 जान क्यों लेते हो
फिर गुज़रे सामने से और फिर मुझपे हँस गये

शब्दार्थ:
1. धर्मोपदेशक, 2. आँसू, 3. कमज़ोर, 4. निश्चित, 5. व्यर्थ, 6. याद, 7. बार-बार


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४