बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा मोर मुकुट वाला
बजाये बाँसुरी श्रीकृष्ण हमारा
नाचूँ मगन नाचे वृंदावन सारा
राधा प्रेमी मीरा भी गोपाला
गोपियाँ पुजारन तेरी गोपाला

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा कमल नयन वाला
कजरारी आँखें मधु का प्याला
इनसे कैसा जादू छलका डाला
सलोना रूप बरखा के घन-सा
और दमकत मुख चंद्रमा-सा

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा श्यामल तन वाला
गले में पड़ी प्रेम सुमन माला
प्रकृति का कण-कण मोह डाला
वह महंत सुन्दर हृदय वाला
छलका रहा करुणा का प्याला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८

आया नव वर्ष छंद आनन्द लेकर

भोर पर केसर की सी लालिमा
किसी खिलते कुसुम की तारिणा
किसी वराह की सृष्टि का गोचर
आया नव वर्ष छंद आनन्द लेकर

नव पल्लव पर रवि का प्रथम उत्कार
मिला धरा को जैसे सुख स्वीकार
कोकिल की प्रथम वाणी का स्वर
आया नव वर्ष छंद आनन्द लेकर

मेघ आश्रुत से हुआ धरा शृंगार
पूर्ण चंद्र पर लायी चंद्रिका निखार
बह मधुशीर्य दे रही निज वर
आया नव वर्ष छंद आनन्द लेकर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००१-२००२