ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए

ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए
दिल के कोने-कोने तक छितरे हुए

वह अब कहाँ बाक़ी जो था मुझमें
मैं अब कहाँ ढूँढू जो था तुझमें
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए

भीगी-भीगी थी ज़मीं सूखे पाँव थे
जलते-बुझते पुराने घाव थे
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए

जुगनू दो आँखों में तिरने लगे हैं
चिन्गारियों से चुभने लगे हैं
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए

बुझते हुए दिए को जलाऊँ कैसे
दबी हसरतों को बुझाऊँ कैसे
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

इस पुराने शहर में

इस पुराने शहर में
कुछ पुरानी इमारतें हैं
कुछ खण्डहर हैं
कुछ अजनबी रास्ते हैं

दूर से पत्थर दिखता होगा
बेजान दिल मेरा लगता होगा
छूकर देखो,
दीवारें आज भी साँस लेती हैं
न कहती हैं न सुनती हैं
टूटती-गिरती हैं…

जब भी गुज़रता हूँ
साये मुझको पुकारते हैं
इस पुराने शहर में
कुछ पुरानी इमारतें हैं
कुछ खण्डहर हैं
कुछ अजनबी रास्ते हैं

कितने ख़ाबों के बादल बरसे
कितनी ख़ुशबू की बेले महकीं
हर बार,
नशेमन जलकर खाक हुआ
चिन्गारियाँ,
दिलों में जब-जब दहकीं…

जो भीगकर मिटती हैं
कुछ ऐसी भी इबारतें हैं
इस पुराने शहर में
कुछ पुरानी इमारतें हैं
कुछ खण्डहर हैं
कुछ अजनबी रास्ते हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९ अप्रैल २००३

आज फिर आसमाँ पे

आज फिर आसमाँ पे देखा चाँद, गुलाबी चाँद
आज फिर तेरी आँखों को देख्नने की ख़ाहिश हुई
आज फिर सुलगने लगे मेरी आँखों के आँसू
आज फिर बुझती हुई एक तमन्ना ने अँगड़ाई ली

चाँद हसीन था तेरे जिस्म-सा शामीन था
तेरे ग़म में यह कब मुझसे ग़मगीन था
रोज़ महकता था मगर सुनहरा था
आज कुछ ज़्यादा गुलाबी और गहरा था

आज फिर दिल के जज़्बात बह निकले दिल से
आज फिर उस मकान में तुम्हें देखने की ख़ाहिश हुई
आज फिर कुछ अजीब भँवर थे मेरी धड़कनों में
आज फिर नस-नस में लहू ने चिन्गारी जला दी

तुमसे मेरी मुहब्बत बहुत याद आ रही है
गुलाबी चाँद कह रहा है तू आ रही है
आ लौट आ अब लौट भी आ तू कहाँ है
तुमसे मेरे सपनों का यह हसीं जहाँ है

आज फिर आसमाँ पे देखा चाँद, गुलाबी चाँद
आज फिर तेरी आँखों को देखने की ख़ाहिश हुई
आज फिर कुछ अजीब भँवर थे मेरी धड़कनों में
आज फिर नस-नस में लहू ने चिन्गारी जला दी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १६ अप्रैल २००३

तेरी यादों के साये तले

तेरी यादों के साये तले
जाने हम-
कितनी दूर तक चले
क्या ख़बर कब…
थकते क़दमों की शाम ढले
जाने कब पतझड़ को
महकता सावन मिले
तेरी यादों की शाम
है नीली-नीली
सागर तट की रेत
है गीली-गीली

तेरी यादों के साये तले
जाने हम-
कितनी दूर तक चले
क्या ख़बर किसलिए…
बुझी राख में चिन्गारी जले
जाने क्यों तेरे बिना…
चलते हैं यहाँ सिलसिले
इक डोर बाँधी थी हमने
वह टूटी नहीं है,
दिल को लगी थी जो लगन,
वह छूटी नहीं है…

तेरी यादों के साये तले
जाने हम-
कितनी दूर तक चले
क्या ख़बर कैसे क्या हुआ
जो तुम रुसवा हो गये…
हम बिल्कुल अकेले,
तन्हा रह गये तुम जो गये
जब कोई आहट आती है
तेरी ही याद जगाती है
तन्हा कर-करके हमें
पल-पल तोड़ जाती है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९