रात चाँदनी का दरया हुई

रात चाँदनी का दरया हुई
चल चाँद की कश्ती में दूर चलें
बादलों के पीछे,
तारों की छाँव में…
प्यार का हसीन कसूर करें

आज दिल दिल के क़रीब है
आज मोहब्बत ख़ुशनसीब है
तेरा मुझसे मिलना,
इत्तिफ़ाक़ नहीं…
क्यों हम एक-दूसरे से दूर रहें

रात चाँदनी का दरया हुई
चल चाँद की कश्ती में दूर चलें

गुलाबी फूल दिलों में खिले हैं
नयी ख़ुशबू जिस्मों में घुले है
और कोई हुस्न नहीं,
शाम-सी रस्म नहीं…
हम निभाते इश्क़ के दस्तूर रहें

रात चाँदनी का दरया हुई
चल चाँद की कश्ती में दूर चलें


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले

कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले
कभी तेरे आगोश में पनाह मिले
मैं शज़रे-धूप की छाँव में बैठा हूँ
कभी तो इनायते-निगाह मिले

तुम हाथ तो बढ़ा दो मेरे मसीहा
ज़ख़्मों पे रख दो मरहम का फीहा
बेबसी में मेरा दम घुटने लगा है
फिर से सौंधी हुई सुबह मिले

रुख़े-ख़ुशी मेरी तरफ़ मोड़ दो
मेरे दर्द का हर तागा तोड़ दो
एक ही ख़ाहिश है मेरी बरसों से
तेरे दिल में मुझे जगह मिले

मैं अपनी कोशिशों में रहूँ क़ाबिल
इस दरिया को मिले तेरा साहिल
तुम्हीं से ज़िन्दगी को मानी मिला है
काश कि तेरी-मेरी हर राह मिले

मुश्किलें सब यह आसाँ हो जायें
जो हम दो जिस्म एक जाँ हो जायें
लम्हों में सदियाँ तय कर चुका हूँ
तेरा-मेरा दिल किसी तरह मिले


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

उफ़! यह छाँव की उमस

उफ़! यह छाँव की उमस
तौबा यह झूठे फ़साने

उम्मीद की धूप रिस गयी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

कितना काला पड़ गया हूँ

मैं तेरे इश्क़ की छाँव में जल-जलकर
कितना काला पड़ गया हूँ, आकर देख

तू मुझे हुस्न की धूप का एक टुकड़ा दे!


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

टूटे हुए चाँद को

टूटे हुए चाँद को सादे काग़ज़ में लपेटा मैंने
भीगे हुए सूरज को हथेलियों में समेटा मैंने
तारे बसरने लगे और आसमाँ ख़ाली हो गया
उसने एक आइने की तरह मुझे तोड़ दिया है
…तोड़ दिया है

जला दिये दिल के जज़्बात उसने
बढ़ा दिये मेरे मुश्किलात उसने
जीना मेरा जीना बहुत मुश्किल है
यह ज़हर पीना बहुत मुश्किल है

बहार में भी शाख़ों पर ख़िज़ाँ थी
सूखी-सूखी बंजर हर फ़िज़ा थी
फ़िज़ाएँ रंग बदलने लगी हैं
हवाओं के साथ चलने लगी हैं मगर
उसने निगाहों में खिलना छोड़ दिया है
…छोड़ दिया है

फ़िज़ाएँ मौसम के साथ खिलती हैं
और मौसम बदलते रहते हैं
मौसम बदला है तो फ़िज़ा भी बदलेगी
बदले हुए मौसम ने हज़ार रास्तों को
मेरी तरफ़ मोड़ दिया है, मोड़ दिया है
…मोड़ दिया है

शब्दों की स्याही में रिश्ते हैं
फूलों के अर्क़ में रिश्ते हैं
हर शब्द हर फूल में मिलते हैं
हर जिस्म की शाखों पर खिलते हैं
मिलते हैं बिछुड़ते हैं,
बिछुड़ते हैं मिलते हैं
समंदर की लहर जैसे चलते रहते हैं
खिलते हैं महकते हैं
बनते हैं बुझते हैं
यह धूप-छाँव के जैसे रंग बदलते हैं

उसने एक रिश्ता तोड़ा है इक जोड़ दिया है
जोड़कर उसने रिश्ते को फिर तोड़ दिया है
…तोड़ दिया है

जला दिये दिल के जज़्बात उसने
बढ़ा दिये मेरे मुश्किलात उसने
जीना मेरा जीना बहुत मुश्किल है
यह ज़हर पीना बहुत मुश्किल है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९ अप्रैल २००३