अपनी क़िस्मत पे नाज़ करते

अपनी क़िस्मत पे नाज़ करते, ग़ुरूर होता
जो कभी तेरे लबों से हमारा मज़कूर होता

अगरचे हमने छुपाया राज़े-दिल तुम से
डर था तेरी निगाह में यह ना क़ुसूर होता

तुमसे कुछ न कहा इसमें ख़ता हमारी थी
बताता दर्दे-हिज्र जो ना मजबूर होता

क़िस्सा-ए-इश्क़ मुख़्तसर था बहुत
इक और मोड़ होता तो ज़रा मशहूर होता

तुमने मुझे देखकर जाने क्या सोचा होगा
काश मैं शक्ल से ख़ूबसूरत थोड़ा और होता

क्या हम ना पाते अपनी मोहब्बत को
गर हमें अपनी वक़ालत का शऊर होता

हम-तुम मिल ही जाते सनम इक रोज़
जो इश्क़ में आशिक़ों का मिलना दस्तूर होता

हैं आलम में वही रंग नये-पुराने, यादों के
तुम भी होते परेशाँ तो मज़ा ज़रूर होता

तड़प-तड़प के मैंने यह ग़ज़ल लिखी है
काश मेरी क़िस्मत में वह जमाले-हूर होता

पल-पल बिगड़ रहा है हाल तेरे बीमार का
ऐ ‘नज़र’ काश कि आज को वह न दूर होता


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००

जब आसमाँ पे यह हिलाल आया

जब आसमाँ पे यह हिलाल आया
मुझे याद तुमसे विसाल आया

जिस शब तारों की बारात आयी
मुझे तुम्हारा ही ख़्याल आया

हमने कितने सवाब हैं कमाये
जो मेरे हिस्से यह जमाल आया

नाज़ करना ख़ुद पे फ़ितरत है
उम्र पे यह कैसा साल आया

है तेरे इश्क़ को रस्मो-राह
उफ़! निगाह में कैसा गुलाल आया

तुझे देखने के बाद ‘नज़र’ का
शुरुआती दौरे-वबाल आया

हिलाल= दूज का चाँद, सवाब= पुण्य, जमाल= सुन्दरता, दौरे-वबाल= कठिन समय


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३