फ़िराक़ को अजल विसाल को जीवन जाना

फ़िराक़ को अजल विसाल को जीवन जाना
यह कि झूठ को सच मतलब को मन जाना

वहम की धूल जब गिरी पलकों से
हमने सच और झूठ का सारा फ़न जाना

आँखों से आपकी तस्वीर उतारी न गयी
हमने शबो-रोज़ चाँद को रोशन जाना

जिस्म ख़ाहिशमंद था रूह सुलगती थी
हमने बुझते बादलों को सावन जाना

हम भी शाइरी के फ़न सीखने लगे ‘नज़र’
जबसे जन्नतो-जहन्नुम का चलन जाना

फ़िराक़= separetion, अजल=death, fate, विसाल=meeting


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

जैसे-तैसे निभाते हैं

जैसे-तैसे निभाते हैं
प्यार करके पछताते हैं
सच्चे-झूठे सपने तेरे
रातों की नींदें उड़ाते हैं

दो किनारे जिससे मिलते हैं
वह पुल टूट गया
बारिश बाढ़ बनी कि फिर
हाथों से हाथ छूट गया

उम्मीदें क्यों रखते हैं
जो अब रोये जाते हैं
जैसे-तैसे निभाते हैं
प्यार करके पछताते हैं

रुसवाई कुछ और नहीं
एक झूठा बहाना है
क्यों करते हो वादे जिनको
बेमानी हो जाना है

कैसे-कैसे लोग यहाँ
जो बस अपनी सुनाते हैं
जैसे-तैसे निभाते हैं
प्यार करके पछताते हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

मेरा दर्द मेरा दु:ख मेरा अपना है

मेरा दर्द मेरा दु:ख मेरा अपना है
बाक़ी सब झूठ है यह सच्चा सपना है

कल तक लबों पर उसके लिए दुआ थी
आज दुआ में थोड़ा कुछ हिस्सा अपना है

मैं आज चली हूँ नयी मंज़िल की तरफ़
आज मेरी आँखों में एक नया सपना है

बीते हुए लम्हों को कैसे भूलेगा कोई
उसमें तो एक अधूरा रिश्ता अपना  है

जादू का खेल है महब्बत कैसे बचते
क्या करें अब यह टूटा हुआ सपना है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

जो होता है भले के लिए होता है

जो होता है भले के लिए होता है
ख़ुद को समझने के लिए होता है

इंसान की आदत है बदल जाना
कि वह बदलने के लिए होता है

वक़्त रुका है कब किसके लिए
आदतन चलने के लिए होता है

सच-झूठ का दुनिया में है हिसाब
मुँह पर कहने के लिए होता है

माहिर एक तू ही नहीं ज़ीस्त का
बहाना यह जीने के लिए होता है


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००३

एक सफ़्हा

सुबह एक सफ़्हा, शाम एक सफ़्हा
दिन एक सफ़्हा, रात एक सफ़्हा

ज़िंदगी एक सफ़्हा,  साँस एक सफ़्हा
धूप एक सफ़्हा, छाँव एक सफ़्हा

खा़हिश एक सफ़्हा, आरज़ू एक सफ़्हा
खा़ब एक सफ़्हा, आँख एक सफ़्हा

बहार एक सफ़्हा, पतझड़ एक सफ़्हा
झूठ एक सफ़्हा, सच एक सफ़्हा

सूरज एक सफ़्हा, चाँद एक सफ़्हा
ग़ज़ल एक सफ़्हा, गीत एक सफ़्हा

खा़मोशी एक सफ़्हा, हँसी एक सफ़्हा
आँसू एक सफ़्हा, खु़शी एक सफ़्हा

दिल एक सफ़्हा, धड़कन एक सफ़्हा
जिस पर तेरी तस्वीर बनी है,
जिस पर तेरा नाम लिखा है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४