गुलाबी चाँद ने याद किया है तुझे

गुलाबी चाँद ने याद किया है तुझे
एक दर्द का टुकड़ा दिया है मुझे

जिसके साथ बैठा हूँ आज की शाम
ज़हन से जाता नहीं तेरा नाम

आँखें ख़िज़ाँ के ज़र्द पत्तों-सी हैं
तन्हाइयाँ दिल में रहने लगी हैं

रूठ गया है वक़्त का हर लम्हा
फिर कर गया है मुझको तन्हा

नहीं देखा तेरा चेहरा आज की शाम
किसके सर जायेगा यह इल्ज़ाम

ख़ुदा आप जाने बन्दे पर रहमत
किसने खींची है लकीरों में क़िस्मत

मेरा दिल बना है रेत का दरिया
तुझसे मिलने का कौन-सा ज़रिया


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

अजब-सी टीस लगी है

अजब-सी टीस लगी है
दस दूनी बीस लगी है,
आँखों में आँच भरी है
उन्नीस की बीस लगी है

दिल में दर्द उगते हैं
साँसें ठण्डी-ठण्डी हैं,
मेरा हर ख़ाब टूटा है
ख़ाहिश भीख लगी है

डालों से फूल गिर गये
ख़ुशबू के मौसम गये,
आइनों ने धोखा दिया
ज़िन्दा तस्वीर लगी है

रोशनी का दरिया बहे
मुझे कोई अपना कहे,
वह ख़लिश बुझाये तो
ज़िंदगी मरीज़ लगी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले

कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले
कभी तेरे आगोश में पनाह मिले
मैं शज़रे-धूप की छाँव में बैठा हूँ
कभी तो इनायते-निगाह मिले

तुम हाथ तो बढ़ा दो मेरे मसीहा
ज़ख़्मों पे रख दो मरहम का फीहा
बेबसी में मेरा दम घुटने लगा है
फिर से सौंधी हुई सुबह मिले

रुख़े-ख़ुशी मेरी तरफ़ मोड़ दो
मेरे दर्द का हर तागा तोड़ दो
एक ही ख़ाहिश है मेरी बरसों से
तेरे दिल में मुझे जगह मिले

मैं अपनी कोशिशों में रहूँ क़ाबिल
इस दरिया को मिले तेरा साहिल
तुम्हीं से ज़िन्दगी को मानी मिला है
काश कि तेरी-मेरी हर राह मिले

मुश्किलें सब यह आसाँ हो जायें
जो हम दो जिस्म एक जाँ हो जायें
लम्हों में सदियाँ तय कर चुका हूँ
तेरा-मेरा दिल किसी तरह मिले


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

तस्व्वुरे-हुस्नो-सादगिए-‘शीना’

सुबह-सा चेहरा, माथे पर सूरज-सी बिन्दिया
हँसी, जैसे ख़ुशबू हो कोई, गुनगुनाती हुई
आँखें साँवली-सी, कजरारी-सी
ऐसे झुकती और खुलती थीं
जैसे रात पे सुबह का दरिया बहा दिया हो
वह लट जब चेहरे पर गिरती थीं
यूँ लगता था मानो! बादल की ओट में चाँद हो

उसके पाँव की आहट जैसे बादे-सबा फूलों पर
रूप की सादगी ऐसी जैसे सूफ़ी का तस्व्वुर
रंग बिल्कुल गुले-अंदाम ज़रा-सी बनावट नहीं
लब सुर्ख़ थे ऐसे, जिस तरह गुलाब के पैमाने
ज़ुबाँ नाज़ुक मिज़ाज, वाइज़ो-नासेह की तरह
बदन शीशे जैसा, साफ़-शफ़्फ़ाक़-गुल्फ़ाम
अदा में जुज़ सादगी और कुछ नहीं झलकता था

मालूम नहीं, वह बरस ख़ाब का था कि सच था
उसका वह मेरे घर आना
काँधे से गिरते वह कमर पे दुप्पटे की गाँठ
वह दीपावली के दिए, वह सजावट सब
देखना उसे मेरा एक टुक, सुबहो-शाम, रोज़
वह तूफ़ान जी का, कुछ करके दिखा दें
लिखना तेरा नाम दरो-दर पर, आदतन

आज पाँच बरस हो गये…
I’m still reminiscing about you…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३-२००४

यह रात पहाड़ जैसी है कैसे काटे कोई

यह रात पहाड़ जैसी है कैसे काटे कोई
यह फ़ासले मीलों-से कैसे तय करे कोई
दो पल में बिछड़ जाना ख़ाब जैसा है
इश्क़ आग का दरया है कैसे बुझाये कोई

इस टूटे हुए दिल में वही दर्द पुराने हैं
आँखों में सिमटे हुए गुज़रे ज़माने हैं
तेरी यादों को सीने से लगाके अपना बनाके
यह दूरी दिल से दिल की कैसे मिटाये कोई

यह वीराना तेरे बिना आबाद कैसे होगा
दिल को भी ख़ुशियों का एहसास कैसे होगा
पानी होके लहू आँखों से बहने लगा है
बिगड़ी क़िस्मत अपनी कैसे बनाये कोई


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२