दाग़े-शबे-हिज्राँ बुझाये नहीं बुझते

दाग़े-शबे-हिज्राँ बुझाये नहीं बुझते
आँसू बहते हैं इतना छुपाये नहीं छिपते

होता है कभी, शाम आती है चाँद नहीं आता
मरासिम हम से यूँ निभाये नहीं निभते

ख़ुदा के आस्ताँ पे आज भी सर झुकाये हूँ
मगर दाग़े-दिल उसे दिखाये नहीं दिखते

हैं जो हमको ज़ख़्म’ सो तेरे तस्व्वुर से हैं
यह ज़ख़्म सीने से मिटाये नहीं मिटते


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

माहे-कामिल कहूँ कि शाहे-ख़ुदा कहूँ

माहे-कामिल कहूँ कि शाहे-ख़ुदा कहूँ
हुस्न-बानो कहूँ कि रंगे-फ़िज़ा कहूँ
आपको कहूँ तो आख़िर मैं क्या कहूँ

आपका हुस्न तो बेमिसाल है
रूप, रंग, अदा का विसाल है
उन्तिस चाँद में भी दाग़ है
आपका बदन रेशमी आग है

इस रेशमी आग को कहूँ तो क्या कहूँ
हुस्न-बानो कहूँ कि रंगे-फ़िज़ा कहूँ

हुस्न आपका सबसे आला है
रब ने किस साँचे में ढाला है
चाँदनी में खिला हुआ कँवल हो
मुझको अल्लाह का फ़ज़ल हो

अल्लाह के फ़ज़ल को नाम क्या दूँ
माहे-कामिल कहूँ कि शाहे-ख़ुदा कहूँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ३१ मई २००३

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही
वह जो है माहे-कामिल है वही

मुझको तो इख़लास है उसी से
ख़ुदा मुझसे संगदिल ही सही

अजनबी है जी मेरा मुझसे ही
वह दर्द से ग़ाफ़िल ही सही

चश्मे-तर से न बुझी आतिश
यह दाग़े-तहे-दिल ही सही

मरहम न करो घाव पर मेरे
चाहत मेरी नाक़ाबिल ही सही

अंजाम की परवाह है किसको
सीने में शीशाए-दिल ही सही

उफ़ तक न की जाये तेरे ग़म में
नालए-सोज़े-दिल है यही

बोले है तेरा इश्क़ सर चढ़के
ख़ुद में मुकम्मिल है यही

चाँदनी रिदा है रोशनाई आज
शाम को सुबह के साहिल ही सही

अफ़सोस किस बात का नज़र
तमाम उम्र का हासिल है यही


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

वो हमसे हम उनसे रूठते हैं बेवज़ह

मेरा दिल पत्थर था तुझ पर दीवाना हुआ
दीवानगी में लग के ख़ुद से अंजाना हुआ

तेरी सूरत में जो देखा न देखा था आज तक
लाले पड़े जान के ईमान का भी जुर्माना हुआ

हाए किस अदा के साथ देखा तुमने मुझे
बिस्मिल तेरा तीरे-नज़र का निशाना हुआ

मैंने तुम्हें देखा तुम मुझे देखकर मुस्कुराये
बस इसलिए मशहूर यह अफ़साना हुआ

भड़कीं दोनों जानिब इश्क़ की चिंगारियाँ
ख़ुतूत के ज़रिए अब इश्क़ फ़रमाना हुआ

वो हम से हम उन से रूठते हैं बेवज़ह
अब रोज़ उनसे अपना रूठाना मनाना हुआ

शराब की तरह होता है यह इश्क़ भी
बढ़िया उतना ही हुआ जितना कि पुराना हुआ

दर-ब-दर भटकता था किस जुस्त-जू में
कैसा मक़ाम है यह तेरे दिल में ठिकाना हुआ

जल रहा है शबो-रोज़ एक आरज़ू लिए
तेरे दिल की शमा पे मेरा दिल परवाना हुआ

तौबा की थी इक रोज़ मोहब्बत से मगर
तेरी लगन में मेरा यह दिल आशिक़ाना हुआ

बेतरह बेमक़सद जी रहा था मैं ज़िन्दगी
ख़ुश हूँ आज चलो मरने का तो बहाना हुआ

और ज़िन्दगी में क्या कीजिए महज़ इश्क़
इसलिए तुमसे अपने दिल का लगाना हुआ

बेवफ़ा नहीं हूँ और न ही करता हूँ झूठे वादे
इक बार किया वादा मर के भी निभाना हुआ

तुमने चुरा लिया मेरा दिल सबके सामने
अबकि बार मुझको तेरा चैन चुराना हुआ

अब दिल के सभी दाग़ दिखा देंगे हम तुमको
कि तेरी पैमानाए-निगाह को छलकाना हुआ

बड़े ढीठ हो कि सुनते नहीं मेरा हाले-दिल
कि तेरा हाथ पकड़ के मुझको तो सुनाना हुआ

अजनबी हो आज मगर होगे आश्ना भी
किसी तरह तो मुझे तेरा दिल धड़काना हुआ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मसाइले-इश्क़ से छूटा तो उलझा दुनिया में

रोशन है इस तरह दिले-वीराँ1 में दाग़ एक
उजड़े नगर में जैसे जले है चराग़ एक*

मसाइले-इश्क़2 से छूटा तो उलझा दुनिया में
ख़ुदा की नवाज़िश है कि बख़्शा दमाग़3 एक

मैं तो मर ही जाता मगर उसने मरने न दिया
मुझमें रह गयी नाहक़ हसरते-फ़राग़4 एक

करम मुझ पर करो शीशाए-दिल5 तोड़कर मेरा
कि यह महज़ है दर्द से भरा अयाग़6 एक

वो किसके दिल में जा बसा है छोड़कर मुझे
नूरे-इलाही!7 उसके बारे में दे मुझे सुराग़ एक

उसके लगाव ने ठानी है ज़िन्दगी जीने की चाह
याख़ुदा8 तू ऐसे हर लगाव को दे लाग9 एक

कोई आता नहीं यूँ तो मेरे घर की तरफ़ फिर भी
जाने किसको सदा दिया करता है ज़ाग़10 एक

ख़ुदा बुलबुल के नाले हैं चमन में गुल के लिए
काश तू देता मुझे आशियाँ11 के लिए बाग़ एक

कम जिये ज़िन्दगी को और ज़िन्दगी थी बहुत
‘नज़र’ बुझती हुई जल रही है आग एक

*मीर का शे’र माना जाता है, नामालूम किसका शे’र है
1. वीरान दिल में; 2. इश्क़ की समस्याएँ; 3. दिमाग़, brain 4. सुख और शान्ति की इच्छा; 5. दिल रूपी शीशा; 6. प्याला; 7. ईश्वर सही रास्ता दिखा!; 8. ऐ ख़ुदा; 9. दुश्मनी; 10. कौआ, Crow; 11. घर, घोंसला, nest


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५