नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही
मुझको मोहब्बत है’ तुम से ही

नाज़ है तुम्हें’ थोड़ा ग़ुरूर मुझे
मैंने दिल लगाया है’ तुम से ही

आज न पिघला तो कल पिघलेगा
यह बात हम सुनेंगे’ तुम से ही

आज दूरियाँ हैं तेरे-मेरे बीच
ज़रूर कल मिलेंगे’ तुम से ही


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है
दिल को बहलावा नहीं दर्द दिया जाता है
दर्द जो है इश्क़ में वह ही ख़ुदा है सबका
दर्द के पहलू में यार को सजदा किया जाता है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…

तुम याद आ रहे हो और तन्हाई के सन्नाटे हैं
किन-किन दर्दों के बीच ये लम्हे काटे हैं
अब साँसें बिखरी हुई उधड़ी हुई रहती हैं
हमने साँसों के धागे रफ़्ता-रफ़्ता यादों में बाटे हैं

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…

इस जनम में हम मिले हैं क्योंकि हमें मिलना है
तुम्हारे प्यार का फूल मेरे दिल में खिलना है
दूरियाँ तेरे-मेरे बीच कुछ ज़रूर हैं सनम
मगर यह फ़ासला भी एक रोज़ ज़रूर मिटना है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

तुम मेरे हो

तुम मेरे हो, मेरे ही मेरे हो
कितनी हों दूरियाँ, कितने हों फ़ासले
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

दोनों हाथों की लकीरों में लिख लूँ
मैं तुम्हें इस जहाँ से छीन लूँ
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

पागल, शैदाई, क़ातिल हूँ तेरे लिए
हाँ मेरी जान तुम्हें पाने के लिए
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

मुश्किलों को आसाँ करना आता है
मुझे हद से गुज़रना आता है
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

जो तुम्हें देखे उसका अंजाम हूँ
मैं और मैं ही तेरा मक़ाम हूँ
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

लहू के क़तरे-क़तरे में तुम हो
दिल में धड़कनों में तुम हो
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

जान हो, ज़िन्दगी हो, तुम मेरी
ख़ुदा से बन्दगी हो, तुम मेरी
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

आओ तुमको अपना बना लूँ मैं
दिल, जान, सीने से लगा लूँ मैं
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यह रात पहाड़ जैसी है कैसे काटे कोई

यह रात पहाड़ जैसी है कैसे काटे कोई
यह फ़ासले मीलों-से कैसे तय करे कोई
दो पल में बिछड़ जाना ख़ाब जैसा है
इश्क़ आग का दरया है कैसे बुझाये कोई

इस टूटे हुए दिल में वही दर्द पुराने हैं
आँखों में सिमटे हुए गुज़रे ज़माने हैं
तेरी यादों को सीने से लगाके अपना बनाके
यह दूरी दिल से दिल की कैसे मिटाये कोई

यह वीराना तेरे बिना आबाद कैसे होगा
दिल को भी ख़ुशियों का एहसास कैसे होगा
पानी होके लहू आँखों से बहने लगा है
बिगड़ी क़िस्मत अपनी कैसे बनाये कोई


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं

हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों से
अब बात नहीं बनती है तेरी यादों से
इतनी दूरी क्यों है, यह मजबूरी क्यों है
इसका जवाब दो तुम इसका जवाब दो
यह जुदाई क्यों है यह रुसवाई क्यों है
इसका जवाब दो मुझे इसका जवाब दो

यह दिल मेरा तेरी मोहब्बत चाहता है
वह दिल तेरा मेरी मोहब्बत चाहता है
इस मुश्किल से थोड़ी राहत चाहता है

हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों से
अब बात नहीं बनती है तेरी यादों से

ख़ाहिश है तू मेरी, जन्नत है तू मेरी
इस दुनिया में सबसे सुन्दर है तू ही
नीले आकाश में जैसे उड़ता बादल है
नील आँखों में जैसे सजता काजल है
कुछ यूँ मेरे दिल के अन्दर है तू ही
मेरी सजनी तू नील समन्दर है तू ही

हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों से
अब बात नहीं बनती है तेरी यादों से

तुम मेरे जीवन में फिर आ जाओ
तुम मुझे एक बार अपना कह जाओ
फिर जो बोलोगे तुम हम कर जायेंगे
फिर तुम बोलोगे तो हम मर जायेंगे
पर ऐसी ज़िन्दगी हम न जी पायेंगे
तन्हा साँसें ले‍गें हम तन्हा मर जायेंगे

हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों से
अब बात नहीं बनती है तेरी यादों से
इतनी दूरी क्यों है, यह मजबूरी क्यों है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९