आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है
दिल को बहलावा नहीं दर्द दिया जाता है
दर्द जो है इश्क़ में वह ही ख़ुदा है सबका
दर्द के पहलू में यार को सजदा किया जाता है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…

तुम याद आ रहे हो और तन्हाई के सन्नाटे हैं
किन-किन दर्दों के बीच ये लम्हे काटे हैं
अब साँसें बिखरी हुई उधड़ी हुई रहती हैं
हमने साँसों के धागे रफ़्ता-रफ़्ता यादों में बाटे हैं

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…

इस जनम में हम मिले हैं क्योंकि हमें मिलना है
तुम्हारे प्यार का फूल मेरे दिल में खिलना है
दूरियाँ तेरे-मेरे बीच कुछ ज़रूर हैं सनम
मगर यह फ़ासला भी एक रोज़ ज़रूर मिटना है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

अश्क से पहले आँच उठती है

अश्क से पहले आँच उठती है
जब भी तुझपे आँख टिकती है

बाटे हुए सब वक़्त के धागे
पर उनमें अब गिरह दिखती है

थी कभी सीधी-सादी ज़िन्दगी
आज ही बिगड़ी हुई लगती है

निगेबाँ है मेरा पहला इश्क़
तो फ़िक्र मुझको ख़ाक चखती है

गर वह सोचे अश्क बुझते नहीं
रूखी-रूखी आँख मेरी हँसती है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४