मैं हूँ हस्ति-ए-नाचीज़

मैं हूँ हस्ति-ए-नाचीज़’ मुझसे किसी को चाह नहीं
मैं हूँ शिगाफ़े-शीशा’ मुझसे किसी को राह नहीं

मैं आया हूँ जाने किसलिए इस हसीन दुनिया में
किसी की आँखों में मेरे लिए प्यार की निगाह नहीं

मैं हूँ अपने दर्दो-आहो-फ़ुगाँ की आप सदा
शायद इस गुमनाम रात की कोई सुबह नहीं

कोई क्या जाने तन्हाई के साग़र’ हमसे पूछो
कि अब मेरे इस दिल में और ख़ाली जगह नहीं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मैंने अक्सर खोया है उसे

मैंने अक्सर खोया है उसे
जो मेरे दिल के क़रीब आ जाता है
जब किसी की चाह में भटकता हूँ
यह दिल बहुत समझाता है

शायद इसी एक वजह से
किसी की हसरत से जी डरता है
बेपनाह प्यार करता है जिससे
तिल-तिलकर उसके लिए मरता है

कई बार मातम में ख़ुद को
सफ़ेद पोशाक पहने हुए देखा है मैंने
इसीलिए इक दीवार उठा रखी है
निगाहो-निगाहे-पनाह के बीच मैंने

हर शाम ज़हन के दरवाज़े पर
इक माज़ी की दस्तक होती है
तेरा पुराना पता पूछती ज़िन्दगी
मुझसे रोज़ ही रूब-रू होती है

वह यह बारहा कहती है मुझसे
मुझे इश्क़ है तुझसे, तुझी से
और मैं आँख चुराके कहता हूँ
मुझे इश्क़ नहीं तुझसे, किसी से

क्यों चली आयी है इस राह
ख़ुशबू के आवारा बादल की तरह
कि नाचीज़ का दिल काला है
तेरी आँखों के काजल की तरह


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

लहर इक ‘विनय’

लहर इक ‘विनय’
टकराया जो पत्थर से टूट गया
जब भी निकला आगे
उसके हाथों से एक हाथ छूट गया

जब भी बैठता है
वो यारों के साथ तन्हा बैठता है
उसकी यारी इक ख़ता निकली
पास जिसके भी गया वो रूठ गया

लहर इक ‘विनय’
टकराया जो पत्थर से टूट गया

नाचीज़ खु़द को खा़स समझ बैठा
‘वो’ अजनबी पेश रहा
जब दिल की बात ज़ुबाँ पर लाया
मरासिम टूट गया…

जब भी निकला आगे
उसके हाथों से एक हाथ छूट गया

ग़म क्या थे?
अफ़सोस किस बात का करता वह
जब जी में आया उसके
खु़द का दोस्त बनके खु़द से रूठ गया

लहर इक ‘विनय’
टकराया जो पत्थर से टूट गया
जब भी निकला आगे
उसके हाथों से एक हाथ छूट गया


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३