मैं रोज़ नयी तकलीफ़ें बुनता हूँ

मैं रोज़ नयी तकलीफ़ें बुनता हूँ
ज़िन्दगी के इस पुराने करघे पर
कि मैंने कभी सूत भी काता है
रिश्तों के इस टूटे हुए चरख़े पर

आँखें वीरान हैं दूर तक रेत ही रेत है
पानी का कहीं नामो-निशाँ नहीं है
सूरज भी उसकी मुस्कुराहट का ना आया, वो कहाँ है?
मेरी हर रात सूखकर बंजर हो गयी है

मोहब्बत मेरी अफ़साना बन गयी है
मैं रह गया हूँ इक किरदार बनकर…

बेजान यह जिस्म उघड़ने लगा है
रूह पर से सर्प की खाल की तरह
और यह मेरी रूह भी जल रही है
धधकती ख़ुशरंग आग की तरह

वह मुझे मिला था पिछली शामों को, हसीं चाँद जैसे!
उसने भी गुनाह किया है चुप रहकर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

हर गली में ढूँढ़ा तेरा निशाँ

हर गली में ढूँढ़ा तेरा निशाँ
मैं भटकता रहा यहाँ-वहाँ

बेताब है हर लम्हा नज़र
उतरे न इश्क़ का ज़हर

प्यास है तेरे दीदार की
चाहत है तेरे एतबार की

रुख़ पे ज़ुल्फ़ परेशान है
अधूरी तेरी-मेरी दास्तान है

तस्वीरें तेरी चुनता रहा
रोज़ नये ख़ाब बुनता रहा

तस्वीरों से बात करता हूँ मैं
प्यार तुमसे करता हूँ मैं

संगदिल से इल्तिजा की
ख़ुदा से तेरे लिए दुआ की

किस दर पे न माँगा तुम्हें
अब तक क्यों न पाया तुम्हें


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला
मुझको हर गाम नीचा दिखाके क्या मिला
हर वक़्त इम्तिहान और बस इम्तिहान
मुझको राहे-ख़ुदा में और कुछ भी न मिला

ख़ाली सीने में दर्द ही ज़मीं दर्द ही आसमाँ
दूर तक राहों में दर्द के निशाँ बस निशाँ
बाहर आ गया जिगर फाड़ के क़तराए-लहू
ऐ ख़ुदा तूने दिया मुझको किस बात का सिला

हँसना मुझे रक़ीब का’ तीर-सा लगता है
रखे अगर वह बैर मुझसे रखता है
जाने उसकी आँखों में मैं खटकता हूँ कि नहीं
ऐ ख़ुदा हर बार मैं ही क्यों मूँग-सा दला

राहे-इश्क़ में मुझे पत्थर का दिल नहीं
ज़ीस्त यह गँवारा मुझे बिल्कुल नहीं
मैं ख़ुदा को किसका वास्ता देकर कहूँ कि बस!
ख़ुदा-ख़ुदा कहने से हासिल कुछ भी न मिला

अपने ज़ख़्मों पे ख़ुद आप मरहम रखूँ
यह दर्द अगर कहूँ तो आख़िर किससे कहूँ
बात-बात पे ख़ुद से बिगड़ना आदत बन गयी
दरबारे-ख़ुदा से मुझको कुछ भी न मिला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मैं हूँ चाँद है तुम भी होगी कहीं

मैं हूँ, चाँद है, तुम भी होगी कहीं
मैं देखता हूँ जो चाँद को…
तुम भी इसे देखती होगी कहीं

माहे-कामिल ने देखा है मुझे
तेरे पाँव के निशाँ पे सजदा करते हुए
सहर उस वक़्त दरक रही थी
सूरज आ रहा था कमसिन किरनें लिए

यह हवा यह घटाएँ
सभी से मैंने कहा था, कहना
मुझे प्यार है तुमसे
जाने तुमने मेरी सदा को
महसूस किया होगा कि नहीं

मैं तन्हा ही तन्हाइयों को दोहराता हूँ
दिल की सदाओं से तुमको बुलाता हूँ
तुम चले आओ सुनकर मेरी सदा
मैं रोज़ ही गीली पलकें सुखाता हूँ

मेरी आँखों ने देखे हैं
कई टूटते हुए सितारे
जिनको तुमने भी देखा होगा
जाने उन्होंने तुमको मेरी
क़िस्मत में लिखा होगा कि नहीं

माहे-कामिल= full moon, पूर्णिमा का चाँद


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १८ मई २००३

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी

दरख़्त की शाख़ों पर
धूप की बूँदें नहीं
सूरज का दरिया है

छोटी-छोटी
नन्हीं मासूम बेलें
शाख़ों से खुलकर
तड़फड़ाने लगीं…

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी

पाँव सूखे थे
ज़मीं ने सोख लिये
मुड़के देखा तो
निशाँ कहीं न थे

रात आयी तो
चाँद बरसने लगा
सहर फिर मुझे
आज़माने लगी

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २५ अप्रैल २००३