ऐ दिल वहाँ चल जहाँ रहते हैं वह

ऐ दिल वहाँ चल जहाँ रहते हैं वह
उनके बिना कितने पल गुज़ारे हैं
खोये-खोये सारे वह बीते नज़ारें हैं

हाथों की लकीरों में उनका नाम है
कहाँ मुझसे दूर खोये हुए हैं वह
कुछ भी नहीं है उनकी यादों के सिवा
किसी से न गिला मेरा न शिकवा

तू प्यासा रेगिस्तान है बारिश वह
ऐ दिल वहाँ चल जहाँ रहते हैं वह

लम्बा सफ़र है राहें हैं सूखी-सूखी
फिर भी राहों के किनारे ताड़ हैं उगी
बरसों का सफ़र दिल में उनका बसर
उनको ही ढूँढ़ती है नज़र हर नज़र

ऐ दिल वहाँ चल जहाँ रहते हैं वह
उनकी यादों में खोये हुए हैं हम
थोड़े जागे थोड़े सोये हुए हैं हम

तू प्यासा रेगिस्तान है बारिश वह
ऐ दिल वहाँ चल जहाँ रहते हैं वह

खिलेंगे गुल हज़ार रंग के नये-नये
मिल गये जो इन्हीं रास्तों पर वह
गुलों की वादियाँ अगर चाहिए तुझे
काँटों की तहों पर चल मिलेंगे वह

ऐ दिल वहाँ चल जहाँ रहते हैं वह
किसी मोड़ के बाद आयेगी मंज़िल
चलता चल राह नयी ऐ मेरे दिल

तू प्यासा रेगिस्तान है बारिश वह
ऐ दिल वहाँ चल जहाँ रहते हैं वह


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

वह कहाँ चले गये

वह कहाँ चले गये
जो कल घर आये थे हमारे
थोड़ा-सा और क़रीब हमारे
वह कहाँ चले गये
जो कल घर आये थे हमारे

बड़ी रहमत की थी
जो आये किसी बहाने से
उनके चेहरे पर थी
दबी-सी मुस्कुराहट
आँखें कह रही थीं
अनकहे अफ़साने

वह कहाँ चले गये
जो कल घर आये थे हमारे
कुछ न कहकर भी
सब कुछ कह गये
तोहफ़े में हमें
अपनी यादें दे गये

वह कहाँ चले गये
जो कल घर आये थे हमारे
दिल ने चाहा था
कुछ देर और ठहरें
और कुछ देखें नज़ारें
जो सजाये थे मैंने

वह कहाँ चले गये
जो कल घर आये थे हमारे
पहला करम था उनका
जब नज़रें मिलायी थीं
नज़रें मिलाकर
निगाहें झुकायी थीं

वह कहाँ चले गये
जो कल घर आये थे हमारे
फ़र्श पर जो निशाँ बने
वह  तो मिट गये
मिटे कब वह निशाँ
जो दिल पर रह गये

वह कहाँ चले गये
जो कल घर आये थे हमारे
दिल चाहता था
वह पास बैठें हमारे
दीदार करें हम
खींचे उनकी तस्वीरें

वह कहाँ चले गये
जो कल घर आये थे हमारे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

मीठी-मीठी बातें

मीठी-मीठी बातें
वह शबनमी रातें
सब याद हैं हमें
वह रस्ते वह रिश्ते
जो हमने क़ायम किये थे
वादे जो हमने किये थे
सब वैसे के वैसे हैं
कल के जैसे-
सब कुछ आज है

हम तो चले तेरी डगर
कुछ यादें लिए
कुछ वादे लिए
महकी हवाओं से
बातें करते हुए
हम तो चले तेरी डगर

मीठी-मीठी बातें
वह शबनमी रातें
सब याद हैं हमें
हम तो चले तेरी डगर

हसीन नज़ारें हैं,
अम्बर में सितारे हैं
फिर भी तेरी कमी है
दिल में कोई बात है
उलझे हुए जज़्बात हैं
सुलझायेंगे उनसे मिलके
जो उलझे हुए…

हम तो चले तेरी डगर
कुछ वादे लिए
कुछ इरादे लिए
जाती बहारों से
कुछ सीख लिए
हम तो चले तेरी डगर

मीठी-मीठी बातें
वह शबनमी रातें
सब याद हैं हमें
हम तो चले तेरी डगर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९