शब्द मौन दोनों गालों पर हाथ धरे बैठे हैं

शब्द मौन दोनों गालों पर हाथ धरे बैठे हैं
कोई नहीं, जो कहे सुबह-सुबह, उठो!
आज भी क्या देर तक पड़े सोते रहोगे
कोई नहीं जो मेरी जागती आँखों को,
झूठे ही सोते रहने का झूठा बहाना दे…

shabd maun dono’n gaalo’n par haath dhare baiThe hain
ko’ie nahiin, jo kahe subah-subah, uTho!
aaj bhii kyaa der tak paRe sote rahoge
ko’ie nahiin jo merii jaagtii aamkho’n mein
jhooThe hii sote rahne kaa jhooTha bahaana de…

टिकटिकाती हैं सुइयाँ, पर लौटती नहीं
टहलती हैं ख़याल बनकर, सिसकती हैं
सूरज के कहो, रोशनी ज़रा मद्धम करे…
किससे कहूँ बिखरा पड़ा वक़्त समेट दो
बाँध दो इस कलाई पर राखी की तरह…

TikTikaatii hai su’iyaa’n, par lauT’tii nahiin
Tahlati hain kh.ayaal bankar, sisakatii hain
sooraj se kaho, roshanii zaraa maddham kare
kisse kahoon bikhraa paRaa waqt sameT do
baandh do iss kalaa’ie par raakhii kii tarah…

Penned: 07:20 21-08-2013
(c) Vinay Prajapati, All Rights Reserved.


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०१३

फ़िज़ा में रंग घुल जाते हैं

मैं कभी सोचता हूँ कि
मेरी दुनिया क्या है?
ये दिल है
जो प्यार जैसे हुस्न के लिए तड़पता है
या वो
जिसका नाम ज़ुबाँ पर आते ही
फ़िज़ा में रंग घुल जाते हैं…

इक रोज़ मेरी मोहब्बत तारीख़ होगी
मेरी बात बारीक़ से भी बारीक़ होगी

मैं इश्क़ की जिस हद से गुज़र गया हूँ
क्या तू कभी उसमें शरीक़ होगी

शुआ किस सहर का इंतज़ार करती है
शायद तेरी नज़र से तख़लीक़ होगी

तेरी सादगी के सदक़े मरना चाहता हूँ
क्या कोई नीयत इतनी शरीफ़ होगी

मोहब्बत जो करे कोई तो रूह से करे
वरना बादे-मर्ग तकलीफ़ होगी

Penned on 01 January 2005

इक बार तेरा चेहरा फिर देख लूँ

इक बार तेरा चेहरा मैं फिर देख लूँ
यह उम्मीद तू बता मैं कैसे छोड़ दूँ

आ फिर आ जा इक बार फिर आ जा
सूखी आँखों से टूटे हैं टुकड़े आँसू के
मैं न कहूँगा कि तू मेरी हो जाये
तस्वीर सजाऊँ आँखों में तू जो आये

चले जाना हाँ बड़े शौक से तुम
मेरा दिल तोड़ के, इक बार आ जा
बोलते हुए कई चेहरे सुने हैं मैंने
किस तरह मैं उनसे बात कर लूँ

इक बार तेरा चेहरा मैं फिर देख लूँ
यह उम्मीद तू बता मैं कैसे छोड़ दूँ

अब के आना तो बस इक शाम
बैठी रहना रू-ब-रू, रू-ब-रू
ना कुछ कहना ना सुनना
पढ़ते रहना मेरी आँखों की ख़ुशबू

आ जा इक बार, लौट के आ जा
फिर दिल मेरा तोड़ के चली जा
इक बार आ जा, बस इक बार आ जा

कभी ख़ाब में न आना तुम
मगर कभी यादों से न जाना तुम
बस इक यही ख़्वाहिश है
मेरा दिल इक बार फिर तोड़ जा

अरमानों की डोलियाँ जला दे तू
यह ना उठें कभी ख़ाली सीने से
देखो न रोकना तुम कभी मुझे
तन्हाई पीने से, रातों में रोने से

मेरे सीने के ज़ख़्म हरे करने की
कोई नयी तरक़ीब तू ढूँढ़ के ला,
मैं पैतरे तेरे सब जानता हूँ…

इक बार तेरा चेहरा मैं फिर देख लूँ
यह उम्मीद तू बता मैं कैसे छोड़ दूँ

यह नज़्म नहीं बयाने-हाल है मेरा
तेरे सिवा किसी और तस्वीर को
तू बता मैं कैसे अपना मान लूँ…

माटी-माटी कर दे मुझे दफ़्न करके
और जियूँ तो मैं जियूँ किस तरह से

क्या चाहती हो क्यों छोड़ा है मुझे
माना मैं तेरा अपना नहीं मगर
सब कुछ ख़ामोशी क़ुबूल करता हूँ
मैं कब तुझे ख़ुद से दूर करता हूँ

आ जा इक बार आ जा फिर आ जा
मेरा दिल इक बार फिर तोड़ जा
इक बार फिर छोड़ जा मुझको अकेला
तू इन राहों पर, इन्हीं गलियों में…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

ख़ुशबू के आइने ने

ख़ुशबू के आइने ने
मेरे चेहरे पर धूप बिछा दी
जो बात भूल गया था
एक बार फिर याद करा दी

वक़्त ने आवाज़ दी
ऐ ज़िन्दगी आज फिर हैराँ हूँ
कल तक मैं क्या था
सोचो तो आज मैं कहाँ हूँ

सूखे हुए लफ़्ज़ हैं
अब नज़्म की बात क्या होगी
बहार के पुरज़ों ने
अब ज़र्द ख़िज़ाँ को विदा दी

तेरा रेशमी उजला
आइने-सा रुख़ न भूल पाऊँगा
मैं गुज़र रहा हूँ
पर बीती गली न लौट पाऊँगा

अब्र गुज़रे सहरा से
वक़्त की रेत उसने भिगा दी
शज़र की प्यास बुझे
किसने उसको मिराज़ दिखा दी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

नग़मे खिलने लगे हैं

नग़मे खिलने लगे हैं नज़्म महकने लगी है
तेरे एहसास पे धड़कन ग़ज़ल कहने लगी है
साँवली आँखों में सपनों की ख़ुशबू घुलने लगी है
मुसलसल ख़ाबों की भीड़ पलकों में लगने लगी है

बंजर सूखे मैदान सारे सब्ज़ होने लग गये
फूल अरमानों के मेरे मन में खिलने लग गये
सौंधे आसमाँ पर सतरंगी धनुष खिल गया है
पर्वतों पे घटा झुकने लगी है बरसने लगी है

नग़मे खिलने लगे हैं नज़्म महकने लगी है
तेरे एहसास पे धड़कन ग़ज़ल कहने लगी है

दुआओं की सदा मेरी फ़ुग़ाँ असर कर जायेगी
रहमत ख़ुदा की होगी मेरी ज़ीस्त घर आयेगी
बहारो-फ़िज़ा का रंग हर-सू बदलने लगा है
तेरे तस्व्वुर की मद्धम धूप खिलने लगी है

साँवली आँखों में सपनों की ख़ुशबू घुलने लगी है
मुसलसल ख़ाबों की भीड़ पलकों में लगने लगी है

मुसलसल= लगातार, ज़ीस्त= जीवन, हर-सू= चारों तरफ़


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२