बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद यादों की सुनहरी धूप निकली
मैंने अपना बदन सेंका,
ख़्याल महके जब ज़हन पे जमी बर्फ़ पिघली
मैंने तस्वीरे-आज फेंका…

मालती की बेलें औराक़ पे हर्फ़ों की दीवार से लिपटीं
ख़ुशबू-ए-मिज़ाज रखके यह मेरी आँखों में सिमटीं

रोज़ रात शबनम में भीग जाती हैं सारी ख़ाहिशें जब
उड़ चलती है फ़ाख़्ता-ए-मन पुराने शहर की तरफ़

लफ़्ज़ों की मौज ने ली अँगड़ाई रिश्तों के बदन पे
मानूस चेहरों के चराग़ जल उठे ताक-ए-ज़हन पे

इन दिनों उड़ता फिरा हूँ मैं आँधी की तरह आवारा
लूटने के लिए वो पुराने मौसम पतंगों वाले दोबारा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

यह ज़िन्दगी मेरी एक पतंग है

यह ज़िन्दगी मेरी एक पतंग है
मैं जिसको चाहता हूँ
वह मुझसे बेरंग है
उड़ती है बिल्कुल अकेली
ढ़ूढ़ती है कोई सहेली
यह सच है या कोई पहेली
कभी इधर डोलती है
कभी उधर डोलती है
जाने किसमें क्या टटोलती है
यह मुमकिन को
ना-मुमकिन समझती है
जितना समझती है
उतना ही उलझती है

यह ज़िन्दगी मेरी, एक पतंग है
मैं जिसको चाहता हूँ
वह मुझसे बेरंग है
वह साथ नहीं मेरे
फिर भी लगता है मेरे संग है
यह ज़िन्दगी मेरी एक पतंग है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

तेरी अदाओं पर मैं फ़िदा

साहिबा, साहिबा, साहिबा
तेरी अदाओं पर मैं फ़िदा
साहिबा, साहिबा, साहिबा

तू मेरे प्यार की सुबह
तुझको ढूँढ़ती मेरी निगाह
क़ातिलाना तेरी हर अदा
मार न डाले कहीं दिलरुबा

साहिबा, साहिबा, साहिबा
साहिबा, साहिबा, साहिबा

जवानी के जोश में जवाँ
हो न जाये कोई ख़ता
वाक़िफ़ नहीं तू मेरे इश्क़ से
हमनज़र बचके जायेगी कहाँ

साहिबा, साहिबा, साहिबा
साहिबा, साहिबा, साहिबा

तू जान है मेरे जिस्म की
कैसे रहेगी मुझसे जुदा
देख हाल मेरा बेहाल है
दूर कैसे तू मेरी जाने-वफ़ा

साहिबा, साहिबा, साहिबा
साहिबा, साहिबा, साहिबा

उड़ती-उड़ती तू चली कहाँ
तू पतंग है मेरी मैं हवा
तू किस सोच में डूबी है
सुन तो बात मेरी ज़रा

साहिबा, साहिबा, साहिबा
साहिबा, साहिबा, साहिबा

हसीना तुझको देखकर
हवाओं में कैसा शोर मचा
रुबा से दिलरुबा बनाया
देख तू न होना कभी ख़फ़ा

साहिबा, साहिबा, साहिबा
साहिबा, साहिबा, साहिबा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ सुबह-शाम

जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ मैं सुबह-शाम
मंज़िल वह मेरी वह मेरा आख़िरी मुक़ाम

वह रंगीन शाम थी शाम वह गुमनाम थी
नज़रों में नज़ारों में वह वफ़ा बेनाम थी
हूर थी वह किसी चिराग़ का नूर थी
किसी किनारे से जैसे कोई कश्ती दूर थी
देखा जब हमने नज़रें थम ही गयीं
हमें जैसे मंज़िलों की राहें मिल ही गयीं

जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ मैं सुबह-शाम
मंज़िल वह मेरी वह मेरा आख़िरी मुक़ाम

महफ़िल हसीन थी या ख़ूबसूरत समा था
उस पल के लिए जाने दिल मैं कहाँ था
आँखों की गहरी झील जिसकी नहीं तफ़सील
तोड़ दी पतंग किसी ने जब हमने दी ढील
उसका चेहरा जैसे शाम की गहराई में सवेरा
वह सवेरा जिसने किया मेरे दिल में बसेरा

जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ मैं सुबह-शाम
मंज़िल वह मेरी वह मेरा आख़िरी मुक़ाम


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

बचपन की ख़ुशबू

मेरे बचपन की ख़ुशबू मेरे साथ ही चलती है
कभी मेरे ख़ाब में कभी किताब में मिलती है

कभी पतंगों के साथ आसमाँ में उड़ती है
कभी मालती की बेलों में महकती खिलती है

रुचि सोनल जूली नीता बिन्नू संजू पवन प्रीति सोना
जैसे नामों की बिखरी तस्वीर जोड़ते मिलती है

कभी स्कूल में अभय राजीव हर्पित को पूछती है
कभी सआदत गंज की गलियों में टहलती है

फाख़्ता और गौरैया के आशियानों से गुज़रते हुए
मेरे बाएँ पाँव का भँवर सहलाती टटोलती है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२