जो लोग अच्छे होते हैं दिखते नहीं हैं

जो लोग अच्छे होते हैं दिखते नहीं हैं
चाहने वाले बाज़ार में बिकते नहीं हैं

ख़ुद से पराया ग़ैरों से अपना रहे जो
ऐसे लोग एक दिल में टिकते नहीं हैं

सूरत से जो सीरत को छिपाये फिरते हैं
वो कभी सादा चेहरों में दिखते नहीं हैं

होता है नुमाया दिल को दिल से, दोस्त!
मन के भेद परदों में छिपते नहीं हैं

इन्साँ है वह जो जाने इन्सानियत
हैवान कभी निक़ाबों में छिपते नहीं हैं

वक़्त में दब जाती हैं कही-सुनी बातें
हम कभी कुछ दिल में रखते नहीं हैं

पलटते हैं जो कभी माज़ी के पन्नों को
ये आँसू तेरी याद में रुकते नहीं हैं

नहीं मरना आसाँ तो जीना भी आसाँ नहीं
चाहकर मिटने वाले मिटते नहीं हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यह बीते हुए लम्हों का शोर है

यह बीते हुए लम्हों का शोर है
या तन्हाई के ग़म की ख़ामोशी
दिल को कुछ शोर जान पड़ता है
मगर वह कानों में क्यों नहीं

उसने इजाज़त नहीं दी है हमें
उन लम्हों को दोबारा पढ़ने की
गुज़रें है वह कभी इधर से
यह बात भुला देने भूलने की

मेरे दरवाज़े तक राह आती है
मगर खुलती है कहीं और यह
समझाते हैं कभी ख़ुद को हम
या भुला देते हैं भूल जाते हैं

यह बीते हुए लम्हों का शोर है
या तन्हाई के ग़म की ख़ामोशी
दिल को कुछ शोर जान पड़ता है
मगर वह कानों में क्यों नहीं

हम खोलते हैं उन पन्नों को
जिन पर तेरा नाम लिखा था
उड़ जाता है दिल से दर्द वह
जो ख़ुद कभी ख़ुद में सना था

क़ातिल वह मेरे दिल का होगा
कब यह हमसे उसने कहा था
खुल जायेगा वह ज़ख़्म फिर से
जो हमने मुद्दत में सिला था

यह बीते हुए लम्हों का शोर है
या तन्हाई के ग़म की ख़ामोशी
दिल को कुछ शोर जान पड़ता है
मगर वह कानों में क्यों नहीं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

दिल की लगी दिल को दिल से लगी

दिल की लगी दिल को दिल से लगी
जब लगी यह आग फिर न बुझी
यह दिल की लगी है दिल से लगी है
जब यह लगी है फिर कहाँ बुझी है

उठता है तूफ़ाँ दिल में बनते हैं निशाँ
फैला हर दिशा यह यहाँ से वहाँ
बसा है दो दिलों में ख़ुशबू की तरह
नाम मुहब्बत है ख़ुदा की तरह
पतझड़ जाता है और सावन आता है
जब दिल में कोई उन्स जगाता है

दिल की लगी दिल को दिल से लगी
जब लगी यह आग फिर न बुझी
यह दिल की लगी है दिल से लगी है
जब यह लगी है फिर कहाँ बुझी है

चेहरे पर नज़रें रुकीं फिर पलकें झुकीं
होंठों पर नाम है आँखें सपने बुनती हैं
अफ़साने बनते हैं पन्ने भी खुलते हैं
मिटता है सब-कुछ ज़माने से सुनते हैं
कोहरे-से बिछते हैं दो दिल मिटते हैं
मोहब्बत के निशाँ बनते न मिटते हैं

दिल की लगी दिल को दिल से लगी
जब लगी यह आग फिर न बुझी
यह दिल की लगी है दिल से लगी है
जब यह लगी है फिर कहाँ बुझी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

कौन उतारेगा धूल पन्नों पर से

तह पर तह लगी है
कौन उतारेगा धूल पन्नों पर से

आँधियों में…
मैं खड़ा रहा साथ उसके
न उसने मुझको देखा
न मैंने उसको देखा
जब गुज़रा यह सिलसिला
तो पाया –
तह पर तह लगी है,
कौन उतारेगा धूल चेहरों पर से…

जो मुझसे…
आज भी अजनबी है
उसके दिल का संग1
मोम तो हो चुका है
मगर उसको अभी
किसी ने पिघलाया नहीं
जब भी पिघलेगा
चेहरा झुलस जायेगा
कौन हटायेगा मोम रुख़सारों पर से…

आँखें मूँद ली हैं उसने
मगर छिपती कब है रोशनी
उसने मुझको छूकर देखा है
मैंने उसको लिखकर
जब दोनों की निगाहों में
ख़राश की
तह पर तह लगी है
कौन उठायेगा शिकन निगाहों पर से…

मुझको डर है कि
वक़्त उसको मुतमइन2 न कर दे
वो बहुत कमज़ोर है
और न समझ भी
कि खु़दकुशी कर लेगा
तह पर तह लगी है
कौन उतारेगा धूल पन्नों पर से…

शब्दार्थ:
1. पत्थर, stone 2. संतुष्ट, calm

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

एक खु़श्क खा़मोश हसीन चेहरा

एक खु़श्क खा़मोश हसीन चेहरा
बिल्कुल सादा काग़ज़ की तरह
कि आपके लबों को लफ़्ज़ मिलें
और वह मुताबिक़ बदल जाये…

एक जैसे थे दोनों
मेरी मोहब्बत और उसकी सादगी
इनायत ऐसी
कि खु़दा भी मरहबा कह दे…

आज यह उन्स कैसा लम्स कैसे
अजनबी कुछ पन्ने खुलने लगे
इक बार फिर मैं अपनी समझ से परे हो गया
वह मुझको सँभाला दे…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १३/जून/२००३