वक़्त का पहना उतार आये

वक़्त का पहना उतार आये
कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये

ख़ाबों में सही अपना तो माना
दिल को मेरे अपना तो जाना

खट्टे-मीठे रिश्ते चख लिये हैं
कुछ सच्चे पलकों पे रख लिये हैं

ख़ाहिशों का बवण्डर है दिल
दिल को उसके दर पे छोड़ आये

तेरी रज़ा क्या मेरी रज़ा क्या
वफ़ाई-बेवफ़ाई की वजह क्या

दस्तूर-ए-इश्क़ से रिश्ते हुए हैं
दिलों में रहकर फ़रिश्ते हुए हैं

ख़ला-ख़ला सजायी एक महफ़िल
महफ़िलों से उठके चले आये

वक़्त का पहना उतार आये
कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

नग़मे खिलने लगे हैं

नग़मे खिलने लगे हैं नज़्म महकने लगी है
तेरे एहसास पे धड़कन ग़ज़ल कहने लगी है
साँवली आँखों में सपनों की ख़ुशबू घुलने लगी है
मुसलसल ख़ाबों की भीड़ पलकों में लगने लगी है

बंजर सूखे मैदान सारे सब्ज़ होने लग गये
फूल अरमानों के मेरे मन में खिलने लग गये
सौंधे आसमाँ पर सतरंगी धनुष खिल गया है
पर्वतों पे घटा झुकने लगी है बरसने लगी है

नग़मे खिलने लगे हैं नज़्म महकने लगी है
तेरे एहसास पे धड़कन ग़ज़ल कहने लगी है

दुआओं की सदा मेरी फ़ुग़ाँ असर कर जायेगी
रहमत ख़ुदा की होगी मेरी ज़ीस्त घर आयेगी
बहारो-फ़िज़ा का रंग हर-सू बदलने लगा है
तेरे तस्व्वुर की मद्धम धूप खिलने लगी है

साँवली आँखों में सपनों की ख़ुशबू घुलने लगी है
मुसलसल ख़ाबों की भीड़ पलकों में लगने लगी है

मुसलसल= लगातार, ज़ीस्त= जीवन, हर-सू= चारों तरफ़


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

फ़िराक़ को अजल विसाल को जीवन जाना

फ़िराक़ को अजल विसाल को जीवन जाना
यह कि झूठ को सच मतलब को मन जाना

वहम की धूल जब गिरी पलकों से
हमने सच और झूठ का सारा फ़न जाना

आँखों से आपकी तस्वीर उतारी न गयी
हमने शबो-रोज़ चाँद को रोशन जाना

जिस्म ख़ाहिशमंद था रूह सुलगती थी
हमने बुझते बादलों को सावन जाना

हम भी शाइरी के फ़न सीखने लगे ‘नज़र’
जबसे जन्नतो-जहन्नुम का चलन जाना

फ़िराक़= separetion, अजल=death, fate, विसाल=meeting


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

राहों में ढूँढ़ता हूँ कभी

राहों में ढूँढ़ता हूँ कभी
तुम मिलती नहीं यह भी सही
जानो न जानो प्यार क्या
है यह इक नशा-सा
उतरता नहीं आँखों से पलकों पर भी

चाहता है दिल यह, पास तुम रहो
कोई तस्वीर जो आँखों में
छुपाकर रखी थी
समझता नहीं क्यों मैं
कि वह हक़ीक़त हो नहीं सकती

राहों में ढूँढ़ता हूँ कभी
तुम मिलती नहीं यह भी सही

इक़रार है ज़ुबाँ पर
क्या करूँ दिल राज़ी नहीं
हो रहा जो अभी
पहले ऐसा कभी हुआ नहीं
सपनों पर अपने अब यक़ीं रहा नहीं

क्या करूँ अभी वह मैं जानता नहीं
इक सवाल है दिल में मेरे
जो कभी तुम मिलो
तो पूछ लूँगा तुम्हीं से हमनशीं
क्या तुम मिलोगी मुझसे कभी

राहों में ढूँढ़ता हूँ कभी
तुम मिलती नहीं यह भी सही

आ जाओ यहाँ तुम तोड़कर बन्धन
तेरा इन्तिज़ार करता हूँ
समझता था जो पहले वह था ग़लत
जब तुम नज़रों में समाये
तब जाके जाना क्या ग़लत क्या सही

राहों में ढूँढ़ता हूँ कभी
तुम मिलती नहीं यह भी सही…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

ज़िन्दगी के हर्फ़ बदल गये हैं

आइने रातभर रोते रहे
तस्वीरें रातभर जागती रहीं
लम्हे उम्रभर सिसकते रहे
ख़ामोशियाँ उम्रभर ख़ाक फाँकती रहीं

यादें धूप में सूख रही हैं
बातें सब मुरझा गयी हैं
आँखों में दरार पड़ रही है
सपने बंजर हो गये हैं

आँसू बर्फ़ बन गये हैं
ख़ाहिशें तिनके चुन रही हैं
आरज़ू के पाँव थक चुके हैं
ख़्याल ज़मीन में दफ़्न हो गये हैं

साँसें सीने में भीग गयी हैं
उदास सावन टपक रहा है
जंगल तन्हाई में सुलगता है
फूल पलकें झुकाये हुए हैं

ख़ुशबू बे-सदा गल रही है
पलाश के फूल हँस रहे हैं
जड़ें मिट्टी सोख रही हैं
पत्ते सूखी बेलों ने डस लिये हैं

उजाले पत्थरों में जज़्ब हो गये हैं
चाँद धुँध हो रहा है
रात रेत हो गयी है
सितारे रेत के दरया में बह रहे हैं

दर्द तेज़ाब हो गया है
और खु़शी मग़रूर रहती है
मैं शब्द उगलता रहता हूँ
ज़िन्दगी के हर्फ़ बदल गये हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’