और इक आह की ख़लिश देती है

रूह बहुत बेक़रार’ बहुत बेकल है
इस जिस्म से छुटकारा चाहती है
अगर तुम न मिली मुझको…
यह बेक़रारी’ यह बेकली उसी दिन से है
जब तुम्हें पहली बार देखा था…

वह अपलक आँखें
वह थमी हुई साँसें
और वह रवाँ धड़कनों की आवाज़…
सारे एहसास,
तुम्हारे तस्व्वुर से आज भी जाग उठते हैं…

तुम्हारी मोहब्बत मुझे हर दम साँस देती है
और इक आह की ख़लिश देती है
हर लम्हा… हर पल…
मैं कब तक यूँ ही ज़ीस्त की गिरह में फँसा रहूँगा!

मेरा हाथ थाम लो,
हमसफ़र बनके अपना लो मुझे
या फिर अपने ही पाक़ीज़ा हाथों से…
दफ़्न कर दो मुझे,
एक यही चाह मुझे बरसों से है

एक यही चाह मुझे बरसों से है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

जब तक कोई आस उसे आकर पोंछ न दे…

ज़िन्दगी से सौ ग़म एक खु़शी मिलती है
अब तक जितनी राहों से गुज़रा हूँ,
ग़म उठाता रहा हूँ…
रूह छिलती रही है मेरी…

सीने की तह में…
जाने कितने ही ज़ख़्मों के टूटे शीशे और
घावों के जंग खाये हुए लोहे के टुकड़े जमा हैं
ज़रा दम भर को करवट लेता हूँ तो…
जोंक की तरह से सारे सबातो-सुकूँ चूसने लगते हैं

पलकें आँच के ग़ुबार से जल उठती हैं
आँख खुश्क और खुश्क होती जाती है
आँसुओं का इक सैलाब-सा उमड़ पड़ता है यकायक
दरिया बहता ही रहता है
जब तक कोई आस उसे आकर पोंछ न दे…

और खु़शी वह तो यक़ीनन तुम्हीं से है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

उल्टे सूरज की आग जम गयी

सोचा था दिन चढ़ेगा दोपहर तक
तो सूरज की आग
सर्दियों के सर्द बादलों को ग़ुबार कर देगी
बहने लगेगा बदन में जमा हुआ लहू
और झपकने लगेंगी एक टुक अपलक पलकें
लेकिन ऐसा कुछ भी हुआ नहीं

दिन दोपहर तो चढ़ा पर बादल नहीं छटे
कोहरा नहीं पिघला
उल्टे सूरज की आग जम गयी,
ठिठुर गयी…
सर्द हवा ने बुझा दिया दिन का सूरज
उतरने लगा शाम के आगोश में दिन

आज शफ़क़ न गुलाबी न जाफ़रानी थी
बस नीला स्लेटी आकाश
अजीब उदासियों के साथ बैठा रहा
न जाने किसके इन्तिज़ार में…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

एक यही इल्तिजा है…

तुम्हें महसूस हो कि ना हो
मेरे सीने में दर्द है तो सही…

लम्हा-लम्हा जज़्बात पिघलते हैं ग़म की चिंगारियों में,
एहसास उबलते हैं मेरे,
ख़्याल मसलते हैं मुझे…

इक भँवर है आँखों में माज़ी का
मुझको पूरे ज़ोर से खींचता है अपने अंदर…
दिन-दिन, रात-रात, लम्हा-लम्हा, पल-पल
मैं हूँ कि डूबना ही चाहता हूँ
बचने की कोशिश भी नहीं करता

अब तो हाल मेरा यह है कि जिस सिम्त भी देखता हूँ
हर शै में तू नज़र आती है
सिर्फ़ तू….

नहीं चाहता महसूस करे तू मेरा दर्द
मगर कभी फ़ुर्सत मिले तो यह एहसास सुन ले
एक यही इल्तिजा है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

फिर आज किसलिए…

वक़्त की इक और गिरह खुल गयी
रूह में इक और शिगा़फ़ आ गया
बदन की हर साँस दर्द बन गयी
कि रोशनी को फिर अँधेरा खा गया

वक़्त छोटी-छोटी उम्मीदें
हर वो सपना जो आपकी आँखों ने देखा है
कैसे छीन लेता है
मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता

जो रिश्ता मैंने बोया था
उसे अपने हाथों से तुमने खु़द सींचा था
फिर आज किसलिए
ज़ीस्त तेरी उसकी खु़शबू से जुदा है

आँसू आँखों की आँच में
किनारे तक आते-आते धुँआ हो रहे हैं
गीली पुरनम आँखों में
दिल का टुकड़ा-टुकड़ा जल रहा है

मैं बूँद-बूँद वक़्त को
तेरी खा़हिश के लिए जमा करता रहा
आज ऐसा लगता है कि
मैं दरम्याँ कोई दीवार चुन रहा था

मुझे तेरी जुस्तजू अब भी है
पर शायद तू आज भी खु़दग़रज़ है
वरना क्यों खा़मोश है
पहले की तरह कुछ कहता क्यों नहीं

 


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’