गेरुआ तेरे नयना, मस्जिद हैं या जाम

दोहे: 13,11

हृदय को ये तड़पायें, लुटा चैन आराम
गेरुआ तेरे नयना, मस्जिद हैं या जाम
Hruday ko yeh taRpayein, lutaa chain aaraam
geru’aa tere nayanaa, masjid hain ya jaam

बहल जायेगा दिल भी, सुनकर तेरा नाम
बदरा बरसे धरा पर, सूखी पुरनम शाम
bahal jaayega dil bhii, jo liyaa teraa naam
badaraa barse dharaa par, sookhii pur’nam shaam

प्यार करके डर कैसा, होगे क्यों बदनाम
मीठे बोल दो बोलो, ये तो है इल्हाम
pyaar karke Dar kaisaa, hoge kyo’n bad’naam
meethe bol do bolo, ye to hai il’haam

मंदिर में बैठा रहा, मैं पहने एहराम
दुख मैंने कितना सहा, अब तो ला दे जाम
mandir mein baiTha rahaa, main pahne ehraam
dukh maine kitna sahaa, ab to laa de jaam

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Poet: Vinay Prajapati ‘Nazar’
Penned: 22:15 29-08-2013

सहूलियत मत देख रिश्तों में दोस्त

सहूलियत मत देख रिश्तों में दोस्त
फ़र्क़ है इंसाँ और फ़रिश्तों में दोस्त
sahooliyat mat dekh rishto’n mein dost
farq hai insaa’n aur farishto’n mein dost
11:06 25-08-2013

किसी बात का तज़किरा उतना ही कर
नुमाया न हो रंज ‘ किश्तों में दोस्त
kisii baat ka tazkiraa ut’naa hii kar
numaayaa na ho ranj ‘ kishto’n mein dost
11:26 25-08-2013

फ़सल पक रही है सुकूँ है ख़ुशी है
टँगा है वहाँ चाँद दरख़्तों में दोस्त
fasal pak rahii hai sukoo’n hai khushii hai
Ta’ngaa hai wahaa’n chaa’nd darkh.to’n mein dost
13:16 25-08-2013

ग़मी टपकती है अश्क बनके यारब
बुनूँ ख़ाब को ख़ुश्क पत्तों में दोस्त
ghamii Tapakatii hai ashk banke yaarab
bunoo’n kh.aab ko kh.ushk pat’to’n mein dost
14:07 25-08-2013

किताबें खुली हैं’ वो पढ़ भी रहे हैं
हँसी क्यों छिपे बंद बस्तों में दोस्त
kitaabein khulii hain, wo paDh bhii rahe hain
ha’nsii kyo’n chhipe band bassto’n mein dost
15:00 25-08-2013

लिखा नाम तेरा औराक़े-गुल पे
किये सजदे-मस्जूद रस्तों में दोस्त
likhaa naam teraa auraaq-e-gul pe
kiye saj’de-masjood rasto’n mein dost
15:55 25-08-2013

‘नज़र’ दर्द इख़लास की है निशानी
यही ख़ू रखी चंद रिश्तों में दोस्त
‘Nazar’ dard ikh.alaas kii hai nishaanii
yahii kh.oo rakhii chand rishto’n mein dost
16:11 25-08-2013

बहर/Baher:122 122 122 122
बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०१३
Poet Vinay Prajapati
Penned: 16:11 25-08-2013

जानाँ बाक़ी कुछ अपने ख़याल रहने दो

जानाँ बाक़ी कुछ अपने ख़याल रहने दो
सूने जीवन में तन्हा सवाल रहने दो

jaanan baaqi kuchh apne khayaal rahne do
soone jeevan mein tanhaa sawaal rahne do

तुम अगले मोड़ पर मिलो मुझे, शायद ही हो
इस ख़ाहिश का हस्रत से विसाल रहने दो

tum ag’le moR par milo mujhe, shaayad hi ho
is kh.ahish kaa hasrat se visaal rahne do

हैफ़ मैं कह भी न सका तुमसे हाले-दिल कभी
अपने आप से मुझको कुछ मलाल रहने दो

haif main kah bhii na sakaa tumse haal-e-dil kabhii
apne aap se mujhko kuchh malaal rahne do

यह वक़्त बीत जायेगा मगर बदलेगा नहीं
घड़ी की सुइयों में अपनी चाल रहने दो

yah waqt beet jaayega magar bad’lega nahiin
ghaRii kii su’iyon mein apnii chaal rahne do

दुश्मन की गोली का भी न डर रहे मुझको
देश के लिए मेरे लहू में उबाल रहने दो

dushman kii golii ka bhii Dar na rahe mujhko
desh ke liye mere lahoo mein ubaal rahne do

अपना ईमान बेंचकर रुपये कमाने वालों
भूखे पेट के लिए रोटी-दाल रहने दो

apna ei’maan bechkar rupaye kamaane waalon
bhookhe peT ke liye roTi daal rahne do

हम दोस्त न सही लेकिन दुश्मन भी नहीं
बाहम कभी-कभार की बोल-चाल रहने दो

ham dost na sahi lekin dushman bhii nahiin
baaham kabhii-kabhaar kii bol-chal rahne do

हर तरफ़ हंगामा है, धमाके हैं, ख़ून है
रोते हुए बच्चों का यह हाल रहने दो

har taraf hangaama hai, dhamaake hain, kh.oon hai
rote huey bachchhon kaa yah haal… rahne do!

तेरी बातें सोचकर मुस्कुरा लेता हूँ आज भी
तुम मेरे गालों पर यह गुलाल रहने दो

terii baatein sochkar muskuraa leta hoon aaj bhii
tum mere gaalon par yah gulaal rahne do


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००८/२०१३

उस्लूब, उस्लूब, उस्लूब

उस्लूब*, उस्लूब, उस्लूब
क्या पढ़ने वाले इनको समझते हैं
वज़नी हो सीने पर गर ज़ख़्म
उसे पढ़ने वाले दर्द को समझते हैं

* लेखन के नियम अथवा शैली


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

हम सब के सच्चे दोस्त हैं

हम सब के सच्चे दोस्त हैं
हर दिल की बात समझते हैं
उसकी ख़ुशी को हम अपने
ख़ुशी के आँसुओं में रखते हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३