दिल है गुमसुम, प्यार में तेरे

दिल है गुमसुम, प्यार में तेरे, साथी मेरे’
(तुम कहाँ हो)
तुम थे’ तुम हो’ जान मेरी, मेरी ज़िन्दगी’
(तुम कहाँ हो)

हुए तुम मुझ से जुदा, रहने लगा ख़ुद से ख़फ़ा
जहाँ भी है’ वापस लौट आ’ मैं हूँ तुझसे बावफ़ा

रूठे हुए दिन’ उदास रातें, अब मनती नहीं
(तुम कहाँ हो)

तेरी यादों की फाँस है, ज़ख़्मी हर एक साँस है
सूखी-सूखी है ज़मीं’ हर सू बरखा की प्यास है

ऊदी-ऊदी आँखों को’ आज भी इक तिश्नगी है
(तुम कहाँ हो)

राहों पे फूल बिछाती हैं ये बहारें, नज़रों को मैं
आये तू आये कभी’ करूँ पूरा’ तेरे सपनों को मैं

टूटे हुए दिल के टुकड़ों में देखूँ’ मैं सूरत तेरी
(तुम कहाँ हो)

सूरज की किरन चूमती है जब’ खिलती है कली
ज़ुबाँ पे क़तरा-क़तरा’ गलती है’ ग़म की डली

ख़ुशी परायी, हर ग़म’ अब अपना लगता है
(तुम कहाँ हो)


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

ख़ुशबू बिछायी है राहों में

ख़ुशबू बिछायी है राहों में
तुम चले आओ, तुम चले आओ
दिल बेक़रार है बहुत
तुम चले आओ, तुम चले आओ

मौसम बड़ा गुलाबी है
गुलाबी गुल हैं शाख़ों पर
अब और न तरसाओ

ख़ुशबू बिछायी है राहों में
तुम चले आओ…

दिल धड़क रहा है
धड़क रही है नब्ज़-नब्ज़
धड़कनें और न बढ़ाओ

ख़ुशबू बिछायी है राहों में
तुम चले आओ…

बरखा बहार आयी है
बरस रही है धरा पर
अब और न तड़पाओ

ख़ुशबू बिछायी है राहों में
तुम चले आओ…

आँचल उड़ाकर अपना
चेहरा दिखा दो
न चुराओ नज़र, न चुराओ

ख़ुशबू बिछायी है राहों में
तुम चले आओ…
दिल बेक़रार है बहुत
तुम चले आओ…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

तुम्हारी ख़ुशबू से महक उठा है मन

तुम्हारी ख़ुशबू से महक उठा है मन
तुम्हारे तस्व्वुर से भर आये नयन
बरखा की मखमली फुहार से जी तर है
धीरे-धीरे बुझ रही है दर्द की सूजन

लहू फिर ज़ख़्मे-जिगर से बहा है
दर्द तुम्हारा दिल में मेहमान रहा है
सर्द है बरसों से यह ख़िज़ाँ का मौसम
ज़र्द पत्तों में खो गया है कहीं गुलशन

बहार की नर्म धूप कहीं खो गयी है
मानूस वह चाँदनी किसी छत पे सो गयी है
यह उदास फ़ज़िर भी कितनी तवील है
दिखता नहीं दूर तक उफ़क़ का रोगन

तुमको पहली नज़र से चाहा दिलो-जाँ से
हर दुआ में मैंने तुमको माँगा आसमाँ से
मेरी मंज़िल मेरी मोहब्बत हो तुम
कैसे भी तुम मेरी बनो, जुड़ जाये बन्धन


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा मोर मुकुट वाला
बजाये बाँसुरी श्रीकृष्ण हमारा
नाचूँ मगन नाचे वृंदावन सारा
राधा प्रेमी मीरा भी गोपाला
गोपियाँ पुजारन तेरी गोपाला

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा कमल नयन वाला
कजरारी आँखें मधु का प्याला
इनसे कैसा जादू छलका डाला
सलोना रूप बरखा के घन-सा
और दमकत मुख चंद्रमा-सा

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा श्यामल तन वाला
गले में पड़ी प्रेम सुमन माला
प्रकृति का कण-कण मोह डाला
वह महंत सुन्दर हृदय वाला
छलका रहा करुणा का प्याला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८

गुज़रे जो मौसम हैं वह भी आयेंगे

गुज़रे जो मौसम हैं वह भी आयेंगे
तेरे नाम हमने जिन पर लिखे थे
वह पत्ते जब हमें वापस मिल जायेंगे

नया सफ़र है और दिल में सिफ़र है
वह नाम याद है वह शाम याद है
दिल भर जायेंगे जब हम मिल जायेंगे

जाने कब होगा ऐसा बिल्कुल पहले जैसा
अब जाने कब हम तुमसे मिल पायेंगे
एक दिन तेरे निशाँ भी हम पायेंगे

गुज़रे जो मौसम हैं वह भी आयेंगे
तेरे नाम हमने जिन पर लिखे थे
वह पत्ते जब हमें वापस मिल जायेंगे

कल जो था वही मन्ज़र आज भी है
लबों पर तेरा नाम आज भी है
किसे पता क्या कल हम हो जायेंगे

बरखा आती है गुलशन महक जाते हैं
सूखे पेड़ों को पत्ते मिल जाते हैं
ऐसी बरखा जाने कब कहाँ हम पायेंगे

गुज़रे जो मौसम हैं वह भी आयेंगे
तेरे नाम हमने जिन पर लिखे थे
वह पत्ते जब हमें वापस मिल जायेंगे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९