न वह कभी आँखों से उतारा ही गया

न वह कभी आँखों से उतारा ही गया
और न कभी लबों से पिया ही गया
वह इक दर्द का बवण्डर था शायद
न जिसे कभी दिल में सँभाला ही गया

इक कहकशाँ की रोशनी भी खप गयी
न ज़रा पलकों को झपकाया ही गया
आधे-आधे दिल से देखा था मैंने उसे
न वह कभी पूरे दिल से देखा ही गया

तारीक़ी ने सिर्फ़ मेरे पाए ही चुने
और न कभी मुझसे भागा ही गया
टुकड़े कर दिये उसने मेरी आँखों के
न यह ग़म मुझसे भिगोया ही गया

धीरे-धीरे वह मुझसे दूर चलता गया
न मुझसे उसके क़रीब जाया ही गया
बारिश ने खनका दीं शीशम की पत्तियाँ
न रोकर इस दिल को बहलाया ही गया

पाए:feet,  तारीक़ी: darkness


 शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

वक़्त का पहना उतार आये

वक़्त का पहना उतार आये
कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये

ख़ाबों में सही अपना तो माना
दिल को मेरे अपना तो जाना

खट्टे-मीठे रिश्ते चख लिये हैं
कुछ सच्चे पलकों पे रख लिये हैं

ख़ाहिशों का बवण्डर है दिल
दिल को उसके दर पे छोड़ आये

तेरी रज़ा क्या मेरी रज़ा क्या
वफ़ाई-बेवफ़ाई की वजह क्या

दस्तूर-ए-इश्क़ से रिश्ते हुए हैं
दिलों में रहकर फ़रिश्ते हुए हैं

ख़ला-ख़ला सजायी एक महफ़िल
महफ़िलों से उठके चले आये

वक़्त का पहना उतार आये
कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

‘विनय’ हूँ मैं

मैं वो आग हूँ
जो लग जाऊँ तो
जंगल का तिनका-तिनका जला दूँ

फैल जाऊँ चंद लम्हों में
कुछ इस तरह
जैसे आग के बवण्डर
आग के तूफ़ाँ…

मैं हूँ विनय,
‘विनय’ हूँ मैं
एक मेरे सिवा यहाँ कोई कुछ नहीं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ११/अप्रैल/२००३

एक बार फिर

जब तुम्हारा नामो-निशाँ
इक कोहरे के धुँधलके में था
बेक़रारी कुछ कमनुमा थी
किसी गहरे आज़ार पर ही
चीखती थी चिल्लाती थी

मगर जब से तुम्हारी तस्वीर को छुआ है
यह बेक़रारी खा़मोश बैठती ही नहीं,
सीने को सीमाब किये जाती है…
मसाइलों के बवण्डर उठाती है…
हर पल हर लम्हा ज़हन में…

जिससे भी पूछता हूँ तेरा पता
जब वो नहीं देता
यूँ समझ लीजिए कि
जी में आता है खु़द को क़त्ल कर लूँ
या उसे क़त्ल कर दूँ

पर जब ज़हन के गर्म ख़्यालात
आँसुओं की नमी से तर होते हैं
भीगते हैं…,
तुम्हारे ख़्याल’ तुम्हारी चाह
मेरे हाथ बाँध देती है
और चल पड़ता है
बेइख़्तियारी और दर्द का ग़मगीं सफ़र…
एक बार फिर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४