आइने में जब देखा, ख़ुद को पाया है कमशक्ल

यह ना जानूँ मैं जानाँ के क़ाबिल हूँ या नहीं
इक अरसे से दौरे-मोहब्बत में गिरफ़्तार हूँ मैं
बाइसे-सोज़े-दिल जो खुला, तुम्हारा तस्व्वुर था
नहीं जानता कि हूँ क्या मगर तेरा प्यार हूँ मैं

दौलते-जहाँ से क्या मिलेगा बिना तेरे मुझको
देख समन्दरे-दर्द को ख़ुद दर्द बेशुमार हूँ मैं
न सहर देखी कोई’ न कोई शाम देखी है मैंने
तेरे बाद सोज़े-दिल से बहुत बेइख़्तियार हूँ मैं

ख़ालिक से हर दुआ में मैंने माँगा है तुझको
मुझे तेरी चाह है तेरे प्यार का तलबगार हूँ मैं
जीता हूँ इस आस पे इक रोज़ मिलूँगा तुमसे
अपने मर्ज़े-दिल का ख़ुद ही ग़म-गुसार हूँ मैं

आइने में जब देखा, ख़ुद को पाया है कमशक्ल
क्या करूँ जैसा भी हूँ तुझपे जाँ-निसार हूँ मैं
ज़रूर बयाँ करूँगा अपना अरसे-मुहब्बत तुझसे
ना करूँ अगर तो भी कहाँ मानिन्दे-बहार हूँ मै


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

एक बार फिर

जब तुम्हारा नामो-निशाँ
इक कोहरे के धुँधलके में था
बेक़रारी कुछ कमनुमा थी
किसी गहरे आज़ार पर ही
चीखती थी चिल्लाती थी

मगर जब से तुम्हारी तस्वीर को छुआ है
यह बेक़रारी खा़मोश बैठती ही नहीं,
सीने को सीमाब किये जाती है…
मसाइलों के बवण्डर उठाती है…
हर पल हर लम्हा ज़हन में…

जिससे भी पूछता हूँ तेरा पता
जब वो नहीं देता
यूँ समझ लीजिए कि
जी में आता है खु़द को क़त्ल कर लूँ
या उसे क़त्ल कर दूँ

पर जब ज़हन के गर्म ख़्यालात
आँसुओं की नमी से तर होते हैं
भीगते हैं…,
तुम्हारे ख़्याल’ तुम्हारी चाह
मेरे हाथ बाँध देती है
और चल पड़ता है
बेइख़्तियारी और दर्द का ग़मगीं सफ़र…
एक बार फिर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४