मेरी हर नज़र

मेरी हर नज़र बेक़रार’ और रूह बेताब है,
लबों को भी न तस्लीम एक बूँद आब है

रोज़-रोज़ की मुश्किली, यही वह अज़ाब है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

जब कभी मैंने साँस ली

जब कभी मैंने साँस ली
साथ तेरे नाम की फाँस ली

पहरों नाराज़ थे ख़ुद से
आज गुज़रे हैं हद से
बेताब हैं तेरे प्यार में
फिर जायें कैसे ज़िद से

जब कभी मैंने साँस ली…

शहद जैसी शाम घुल गयी
हमको ज़िन्दगी मिल गयी
मोगरे के फूल जब खिले
उनमें तेरी हँसी मिल गयी

जब कभी मैंने साँस ली…

आँखों में तेरे ख़ाबों की रिदा है
धड़कनों की तुझको सदा है
छम-छम छनकेगी ख़ुशी
महकी-महकी तेरे अदा है

जब कभी मैंने साँस ली…

मोगरा: Jasmine Sambac Florapleno, रिदा: coversheet


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

हर गली में ढूँढ़ा तेरा निशाँ

हर गली में ढूँढ़ा तेरा निशाँ
मैं भटकता रहा यहाँ-वहाँ

बेताब है हर लम्हा नज़र
उतरे न इश्क़ का ज़हर

प्यास है तेरे दीदार की
चाहत है तेरे एतबार की

रुख़ पे ज़ुल्फ़ परेशान है
अधूरी तेरी-मेरी दास्तान है

तस्वीरें तेरी चुनता रहा
रोज़ नये ख़ाब बुनता रहा

तस्वीरों से बात करता हूँ मैं
प्यार तुमसे करता हूँ मैं

संगदिल से इल्तिजा की
ख़ुदा से तेरे लिए दुआ की

किस दर पे न माँगा तुम्हें
अब तक क्यों न पाया तुम्हें


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

जब प्यार किसी से होता है

एक ख़ुशबू जाने कहाँ से आयी है
कुछ दिनों से दिल पर छायी है
शायद, शायद ऐसा तब लगता है
जब प्यार किसी से होता है

ख़ाबों में जाने कौन आने लगा है
रातों को नींदें चुराने लगा है
शायद, शायद ऐसा तब होता है
जब प्यार किसी से होता है

जब से वह ख़ाबों में आया है
दिल बेचैन रहने लगा है
उसको सामने हर पल देखने को
दिल बेताब रहने लगा है

शायद, शायद ऐसा तब लगता है
जब प्यार किसी से होता है

अन्जाना नहीं जाना-पहचाना है
सपना है उसको अपना बनाना है
शायद, शायद ऐसा तब होता है
जब प्यार किसी से होता है

अब वह मेरी मंज़िल बन गयी
अब वह मेरा सपना है
वह दिल की धड़कन बन गयी
अब वह मेरी तमन्ना है

शायद, शायद ऐसा तब लगता है
जब प्यार किसी से होता है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

चाँद गवाह है मेरे प्यार का

चाँद गवाह है मेरे प्यार का
क्या यही ख़्याल है, मेरे यार का
कुछ न ख़बर हुई उस पल की
कुछ न पता चला उस पल का
उसके चेहरे पर नज़र रुकी
क्या ख़बर क्या गया, क्या मिला

हर लम्हा इन्तज़ार नये ख़ाब का
क्या ऐसा ही हाल है मेरे यार का
जाने ना मिलें या न मिलें
उनसे हम कभी दोबारा
जाने फिर खिले या न खिले
वह गुलशन देखा हुआ नज़ारा

चाँद गवाह है मेरे प्यार का
क्या यही ख़्याल है, मेरे यार का

मैंने जिसे चाहा उसने मुझे चाहा
इस बात की ख़बर नहीं
बहती हवा भी मुँहज़ोर नहीं
तन में तपिश करती है चाँदनी
यह असर है पहले प्यार का
क्या ऐसा ही हाल है मेरे यार का

चाँद गवाह है मेरे प्यार का
क्या यही ख़्याल है, मेरे यार का

दिल में दर्द की आतिश जल रही है
तुम्हें पाने की चाहत बढ़ रही है
दिल मेरा बेताब है
जाने कहाँ दमका माहताब है
ऐसा रूप-रंग है मेरे यार का
रोशन कर दे दिल जाँनिसार का

चाँद गवाह है मेरे प्यार का
क्या यही ख़्याल है, मेरे यार का


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९