ख़लिश को जगह न दो दिल में

ख़लिश को जगह न दो दिल में
नासूर बन जायेगी
मरहम भी न लगा पाओगे
साँस घुट के मर जायेगी
ज़ीस्त अलग है, ज़ीस्त जीना अलग
समझे ‘नज़र’!
मजलिस में बैठोगे वाइज़ के साथ
बाँह खुल जायेगी…

ज़ीस्त= जीवन, Life


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

फिर क्यों दोनों तन्हा

एक ही रास्ता जब है दोनों का
फिर क्यों दोनों तन्हा
फिर क्यों दोनों तन्हा

मेरा मरहम है तू
मेरा मज़हब है तू
आँखों में तेरा ही चेहरा

कंचन भी तू है
चंदन भी तू है
दिल चाहे तेरा ही रहना

एक ही रास्ता जब है दोनों का
फिर क्यों दोनों तन्हा
फिर क्यों दोनों तन्हा

मन मन्दिर है तू
कितनी सुन्दर है तू
तेरे बिन लागे दिल ना

मेरा मंज़िल तू है
मेरा साहिल तू है
दिल चाहे तुझको पाना

एक ही रास्ता जब है दोनों का
फिर क्यों दोनों तन्हा
फिर क्यों दोनों तन्हा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

हसीन उस नाज़नीन से कोई नहीं

हसीन उस नाज़नीन से कोई नहीं
ज़्यादा उस महज़बीन से कोई नहीं

न दोस्ती है न बाइसे-गुफ़्तार ही
शिगुफ़्ता उस हसीन से कोई नहीं

दर्द तो दिल का मरहम ठहरा
शिकवा उस जाँनशीन से कोई नहीं

आस उससे मिलने की अभी यहीं है
तस्कीन इस तस्कीन से कोई नहीं

दिल तो पागल है ‘नज़र’ शैदाई है
रंग ख़ुश उस रंगीन से कोई नहीं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही
वह जो है माहे-कामिल है वही

मुझको तो इख़लास है उसी से
ख़ुदा मुझसे संगदिल ही सही

अजनबी है जी मेरा मुझसे ही
वह दर्द से ग़ाफ़िल ही सही

चश्मे-तर से न बुझी आतिश
यह दाग़े-तहे-दिल ही सही

मरहम न करो घाव पर मेरे
चाहत मेरी नाक़ाबिल ही सही

अंजाम की परवाह है किसको
सीने में शीशाए-दिल ही सही

उफ़ तक न की जाये तेरे ग़म में
नालए-सोज़े-दिल है यही

बोले है तेरा इश्क़ सर चढ़के
ख़ुद में मुकम्मिल है यही

चाँदनी रिदा है रोशनाई आज
शाम को सुबह के साहिल ही सही

अफ़सोस किस बात का नज़र
तमाम उम्र का हासिल है यही


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

ज़िन्दगी माने हो तुम

ज़िन्दगी माने हो तुम
साँसें तुम्हारा एहसास हैं
यादें बाइस हैं ज़ीस्त को
तेरी तमन्ना है खु़शी
ग़म है तेरी जुदाई
ज़ख़्मे-दिल ही मरहम
ज़ख़्मे-दिल ही दवा
और चारागर हो तुम…

आप ही हँसना है
आप ही रोना है
दिन-रात ख़्यालों में
तुमसे बातें करना
सब जीने का मतलब है
खा़ली सीने में दिल कहाँ है
वह तो तुम्हारे पास है
जो सीने में धड़कता है
महज़ तुम्हारा एहसास है

जब भी बेले की कली खुलती है
और गुलाब महकता है
यूँ एहसास होता है उसे छूकर
जैसे तुमको छू लिया है
तुम मुझसे नाआश्ना हो
मगर मैं तुमसे दूर नहीं
यह दूरियाँ यह फ़ासले
सब कम हो जायेंगे
बस तुम्हारे घर का पता मिले


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४