कोई तुमसे मुलाक़ात का बहाना ढूँढ़ता है

कोई तुमसे मुलाक़ात का बहाना ढूँढ़ता है
फिर से वही गुज़रा हुआ ज़माना ढूँढ़ता है

वह एक पल जो थम के रह गया है कहीं
उस पल में बीता हुआ अफ़साना ढूँढ़ता है

जिसमें शराब गुलाबी मिला करती थी वहाँ
आज अपने माज़ी का वह पैमाना ढूँढ़ता है

जिसको सुनकर के तुम वापिस लौट आओ
अपनी सदाओं का वह नज़राना ढूँढ़ता है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

तो अब दोस्त रह गये बस नाम के

तो अब दोस्त रह गये बस नाम के
हम अज़ीज़ है जब तक  हैं काम के

मेरे माज़ी से चुरा ले जाता काश
कोई सारे टुकड़े दर्दे-आम के

दोस्ती में दिल जो अपना खोल दिया
पुरज़े बहुत उड़े दिले-नाकाम के

मेरी इक किताब में रखे हैं सभी
ऐ मोहब्बत तेरे किस्से शाम के


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

न रखो वह तस्वीरें हरी जिनसे दिल दुखता हो

न रखो वह तस्वीरें हरी जिनसे दिल दुखता हो
कर दो वह ज़मीनें बंजर जिनमें घाव उगता हो

क्यों सीने में साँस लेवे दर्द किसी बेदर्द का
मिटा दो वह शोलए-दाग़ भी जिससे दिल जलता हो

लुत्फ़ लो उस बात में जिसमें न हो माज़ी की सदा
नोंच दो वह हर ख़ार जो उम्मीदों पर चुभता हो

रोशनी चाहिए हर क़दम पे हमें भी तुम्हें भी
जलाओ वह दिए किसलिए जिनसे धुँआ उठता हो

आँच बटोरो ग़म पी जाओ ज़ीस्त को जीना सीखो ‘वफ़ा’
क्यों जोड़ो उस ख़ाब के टुकड़े जो ख़ुद को छलता हो


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००३

हमने अबस की आरज़ू छोड़ दी

हमने अबस की आरज़ू छोड़ दी
तुमको पाने की जुस्तजू छोड़ दी

चाक़ जिगर को गरेबाँ में छिपाके
हमने हसरते-रफ़ू छोड़ दी

बुलाता रहा माज़ी पलट-पलट के
मगर अब इश्क़ की खू़ छोड़ दी

मैं हूँ अधूरी खा़हिशों का मुब्तिला
ग़ालिबन हमने वो बाज़ू छोड़ दी

है आज मौसम बदला-बदला
वो गुफ़्तार वो गुफ़्तगू छोड़ दी

हर  जगह पाओगे तुम मुझको
मैंने मेरी नज़र चार-सू छोड़ दी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ३१ जुलाई २००४

माज़ी को बहुत खंघालते हैं लोग

माज़ी को बहुत खंघालते हैं लोग
बेतरह मतलब निकालते हैं लोग

हुआ कब मुझ से उनका बुरा
किसलिए नाम मेरा उछालते हैं लोग

ग़लतफ़हमियों की आदत है उन्हें
ग़लतफ़हमियाँ पालते हैं लोग

अपनी पे जब बन आयी है तो देखा है
किस तरह मुझे टालते हैं लोग

मुझे जो देखते हैं गिरता हुआ कहीं
दिखावे के लिए सँभालते हैं लोग

किस तरह यारब समझाऊँ इन्हें
मेरे लहू को बारहा उबालते हैं लोग

कुरेदते हैं वक़्त-ब-वक़्त मुझे
ज़ख़्मों पे रोज़ नमक डालते हैं लोग

बनाते हैं रोज़ नयी कहानियाँ ये
मुझे नये क़िस्से में ढालते हैं लोग

बनकर आते हैं हमदर्द मेरे
और आँखों में मिर्च चालते हैं लोग


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २० सितम्बर २००४