बड़ी उदास दोपहर है

बड़ी उदास दोपहर है, दिल भी ख़ाली
मेरा कमरा भी ख़ाली…

कुछ यादों का धुँधलाया हुआ-सा
एक क़ाफ़िला गुज़र रहा है,
आँख जो भर-भर आ रही है
किनारों की काई फिर सब्ज़ होने लगी है

इक दर्द फिर अँगड़ाई ले रहा है
एक आस फिर तेरी जुस्तजू कर रही है

माज़ी के सफ़्हे पलट रहा हूँ
बीती हुई शामों की नर्म धूप-
मेरा मन पिघला रही है,
बदन में फिर साँस भारी होने लगी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १८/अगस्त/२००४

एक यही इल्तिजा है…

तुम्हें महसूस हो कि ना हो
मेरे सीने में दर्द है तो सही…

लम्हा-लम्हा जज़्बात पिघलते हैं ग़म की चिंगारियों में,
एहसास उबलते हैं मेरे,
ख़्याल मसलते हैं मुझे…

इक भँवर है आँखों में माज़ी का
मुझको पूरे ज़ोर से खींचता है अपने अंदर…
दिन-दिन, रात-रात, लम्हा-लम्हा, पल-पल
मैं हूँ कि डूबना ही चाहता हूँ
बचने की कोशिश भी नहीं करता

अब तो हाल मेरा यह है कि जिस सिम्त भी देखता हूँ
हर शै में तू नज़र आती है
सिर्फ़ तू….

नहीं चाहता महसूस करे तू मेरा दर्द
मगर कभी फ़ुर्सत मिले तो यह एहसास सुन ले
एक यही इल्तिजा है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४