उलझे हुए दिल में तेरी कमी-सी क्यों है

उलझे हुए दिल में तेरी कमी-सी क्यों है
क्या बात है आँखों में नमी-सी क्यों है

तेरी किस बात से यह दिल थम गया
दिल में हर धड़कन सहमी-सी क्यों है

क्या हुआ किस बात से ये दिल टूट गया
टूटे हुए दिल में ये नरमी-सी क्यों है

हमने देखा है तुम्हें हमें देखते हुए
चाहत में इतनी ग़लतफ़हमी-सी क्यों है

रूठे तुम तो फिर मानते भी नहीं हो
तेरे मिज़ाज में इतनी गरमी-सी क्यों है

Shayir: Vinay Prajapati Nazar
Penned on 01 January 2005

बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद यादों की सुनहरी धूप निकली
मैंने अपना बदन सेंका,
ख़्याल महके जब ज़हन पे जमी बर्फ़ पिघली
मैंने तस्वीरे-आज फेंका…

मालती की बेलें औराक़ पे हर्फ़ों की दीवार से लिपटीं
ख़ुशबू-ए-मिज़ाज रखके यह मेरी आँखों में सिमटीं

रोज़ रात शबनम में भीग जाती हैं सारी ख़ाहिशें जब
उड़ चलती है फ़ाख़्ता-ए-मन पुराने शहर की तरफ़

लफ़्ज़ों की मौज ने ली अँगड़ाई रिश्तों के बदन पे
मानूस चेहरों के चराग़ जल उठे ताक-ए-ज़हन पे

इन दिनों उड़ता फिरा हूँ मैं आँधी की तरह आवारा
लूटने के लिए वो पुराने मौसम पतंगों वाले दोबारा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

एक लड़की

एक लड़की मुझको सारा दिन परेशाँ किये घूमती है
ख़ाबों में भी आयी ख़्यालों को हैराँ किये रहती है

उसकी बातों में जाने कैसी ख़ुशबू है नाज़ुक मिज़ाज की
अदाए-हरकत है कभी गुल तो कभी मिराज़ की

यूँ तो इस जा में मेरी शख़्सियत है खाकसार-सी
लफ़्ज़ यूँ बुनती है’ जैसे हूँ तबीयत ख़ाबे-ख़ुमार की

चाहती क्या है, बात क्या है, मैं पता करूँ तो कैसे?
दर्दो-ग़म की बात छोड़, दिल का भेद तो कह दे!


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४