वह इक पल संजो लिया है

वह इक पल संजो लिया है
आँख में रखके भिगो दिया है
महक रहे हैं वह सारे लम्हे
ख़ुद को उनमें डबो दिया है

ख़ुश-रू तेरी मीठी-मीठी बातें
उफ़ तौबा यह हिज्र की रातें
धुँधले-धुँधले चाँद के चेहरे
गुज़र रही हैं मिसरी जैसी रातें

सोया जाऊँ यह रात तो गुज़रे
सुबह आयें तेरे ख़ाब सुनहरे
मुझको जगा दे उससे मिला दे
यार से मिलके यह ख़िज़ाँ उतरे

महक रहे हैं जो फूल गुलाबी
मद्धम धूप इनपे बिछा दी
अपने दिन यूँ ही गुज़रते हैं
किसकी आँखों ने शाम दिखा दी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मीठी-मीठी बातें

मीठी-मीठी बातें
वह शबनमी रातें
सब याद हैं हमें
वह रस्ते वह रिश्ते
जो हमने क़ायम किये थे
वादे जो हमने किये थे
सब वैसे के वैसे हैं
कल के जैसे-
सब कुछ आज है

हम तो चले तेरी डगर
कुछ यादें लिए
कुछ वादे लिए
महकी हवाओं से
बातें करते हुए
हम तो चले तेरी डगर

मीठी-मीठी बातें
वह शबनमी रातें
सब याद हैं हमें
हम तो चले तेरी डगर

हसीन नज़ारें हैं,
अम्बर में सितारे हैं
फिर भी तेरी कमी है
दिल में कोई बात है
उलझे हुए जज़्बात हैं
सुलझायेंगे उनसे मिलके
जो उलझे हुए…

हम तो चले तेरी डगर
कुछ वादे लिए
कुछ इरादे लिए
जाती बहारों से
कुछ सीख लिए
हम तो चले तेरी डगर

मीठी-मीठी बातें
वह शबनमी रातें
सब याद हैं हमें
हम तो चले तेरी डगर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

शीशाए-अश्क आते रहे

शीशाए-अश्क आते रहे क़तरा-क़तरा लहू रुलाते रहे
हम दीवानों की ख़ैर भला कौन पूछे लोग आते-जाते रहे

हम रखते हैं दोस्ती का पास हर दफ़ा कोई रखता नहीं
बेवजह हम पे लोग ग़लत इल्ज़ाम लगाते रहे

हमने सुना था दर्द की मिसरी बहुत मीठी होती है
जो लोग भी हमसे मिलने आये थोड़ी-थोड़ी साथ लाते रहे

ख़ुदा हाफ़िज़ तो एक बार किसी भी जाने वाले ने न कहा
उल्टे हमारी शमशीर से अपनी तलवारें लड़ाते रहे

बुरा न मान ज़माने का ‘वफ़ा’ मेरे ये सब एक जैसे हैं
अपनी बाइसे-बद्-निअ़त तेरे दिल को दुखाते रहे


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००४

तुमको सबसे सच्ची दोस्ती मिले

तुमको ज़िन्दगी की हर ख़ुशी मिले
तेरे लबों को मीठी-मीठी हँसी मिले

हर दिन तुम्हें बहार का दिन हो
कभी न तेरी आँखों को नमी मिले

तुम जो हो जैसी हो सबसे अच्छी हो
तुमको सबसे सच्ची दोस्ती मिले

फूल का खिलना है तुम्हारा हँसना
तुम्हें सदा सहर की ताज़गी मिले


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५