मैं रोज़ नयी तकलीफ़ें बुनता हूँ

मैं रोज़ नयी तकलीफ़ें बुनता हूँ
ज़िन्दगी के इस पुराने करघे पर
कि मैंने कभी सूत भी काता है
रिश्तों के इस टूटे हुए चरख़े पर

आँखें वीरान हैं दूर तक रेत ही रेत है
पानी का कहीं नामो-निशाँ नहीं है
सूरज भी उसकी मुस्कुराहट का ना आया, वो कहाँ है?
मेरी हर रात सूखकर बंजर हो गयी है

मोहब्बत मेरी अफ़साना बन गयी है
मैं रह गया हूँ इक किरदार बनकर…

बेजान यह जिस्म उघड़ने लगा है
रूह पर से सर्प की खाल की तरह
और यह मेरी रूह भी जल रही है
धधकती ख़ुशरंग आग की तरह

वह मुझे मिला था पिछली शामों को, हसीं चाँद जैसे!
उसने भी गुनाह किया है चुप रहकर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

मैं क्यों आज तक उसकी ख़ाहिश करता हूँ

मैं क्यों आज तक उसकी ख़ाहिश करता हूँ
जो मुझको भीड़ में अकेला छोड़कर गया है
सुबह आज भी उसको आइनों में जोड़ता हूँ
जो मेरे दिल को खिलौने-सा तोड़कर गया है…

बे-तस्कीनियाँ उजले चेहरों से बढ़ती हैं
हर पल मुझको अक्स की तरह पढ़ती हैं
अंधेरी रात है मैं छत पर तन्हा बैठा हूँ
एक-एक पल दोपहर-सा गुज़र रहा है…

कोई उठाये मुझको या फिर बैठा रहने दे
ख़ाबों के जंगल जलाये ना, धुँआ उड़ाये ना
ख़ाहिशों का अम्बार है, दिल ज़ार-ज़ार है
आँखों की नदिया सुखाये ना, चाँद जलाये ना

अजीब धुनकी में है दिल और कुछ नहीं है
दर्द का ग़ुबार है दिल और कुछ नहीं है
मुस्कुराहट जब खिली गुलाबी लबों पर
एक हसीन ख़ाब सारी रात जागता रहा है…

एक नयी परवाज़ दिखायी दी है आसमाँ में
कुछ नये अन्दाज़ भी हैं उसकी ज़बाँ में
बाँट नहीं सकता किसी से लम्हों के टुकड़े
ख़ुदाया मेरा कोई नहीं इतने बड़े जहाँ में


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
चाँदनी छलकाता है तुम्हारा जिस्म सुनहरा

क्योंकर प्यार न आये नरगिसी आँखों पर
क्योंकर गुल न महकाये बहार शाखों पर

इस दीवाने को दीवानगी सिखायी किसने
दिल में उसके यह आग लगायी जिसने

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
चाँदनी छलकाता है तुम्हारा जिस्म सुनहरा

किस क़ातिल अदा से तुमने तीर चलाया है
अपनी नज़रों से मेरा जिस्म महकाया है

क्योंकर शोलों पर चलने का ग़म होगा
जब तुम जैसा साथ कोई हमदम होगा

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
चाँदनी छलकाता है तुम्हारा जिस्म सुनहरा

इश्क़ की मय आँखों से पिला दी है तुमने
और जन्नत की रहगुज़र पा ली है हमने

वाक़िफ़ नहीं तू मेरी मोहब्बत से जाने-जाँ
तेरे साथ जो न गुज़रा वो लम्हा’ लम्हा कहाँ

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
चाँदनी छलकाता है तुम्हारा जिस्म सुनहरा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

जब भी तेरा नाम लेती हैं

जब भी तेरा नाम लेती हैं
बहुत ख़ुश होती हैं आँखें
मुस्कुराती हैं तेरे लबों से
कहीं ज़्यादा हसीं होके…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

तेरी चुप निगाहें

तेरी चुप निगाहें व शर्मायी नज़रें
तेरे प्यार का तोहफ़ा हैं, मेरे लिए
एक बार तो कुछ कह दे सनम
तू एक बार तो हाँ कर दे मुझसे
ज़िन्दगी एक झमेला है मेरे लिए

तेरी मुस्कुराहटें तेरी सादी अदाएँ
तेरे प्यार का तोहफ़ा हैं मेरे लिए
परियों से भी कहीं ज़्यादा हसीं
खिलती कलियों-सी तू माहजबीं
ख़ुदा ने तुझे बनाया है मेरे लिए

तेरे सारे शिकवे वह सभी यादें
तेरे प्यार का तोहफ़ा हैं मेरे लिए
मुझे तेरा इन्तिज़ार था बरसों से
हम एक-दूजे के बने जनमों से
तुमने जनम लिया है मेरे लिए

आँखों में माहताब-सा चमकता है
तेरा चेहरा, तेरा चेहरा, तेरा चेहरा
मैं सहराँ-सहराँ भटकता हूँ तेरे लिए
तू एक बार तो हाँ कर दे मुझसे
ज़िन्दगी एक झमेला है मेरे लिए


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९